व्यापारियों को ग्रे पुराने धारा-धोरण से खरीदने की सोश्यल मीडिया पर अपील


(PC : apparelresources.com)

सूरत।सूरत कपड़ा मार्केट में व्यापारियों से ग्रे कपड़ा पुराने धारा-धोरण में खरीदने की अपील सोश्यल मीडिया में की जा रही है।कपड़ा व्यापारियों से कहा जा रहा है कि वीवर्स सीजन समय में अपने हिसाब से नया धारा-धोरण बनाकर कपड़ा बेचते हैं।सीजन में व्यापारी को विवरों के थोपे धारा-धोरण के हिसाब से ही माल खरीदना पड़ता है व उनके ही धारा-धोरण से पेमेंट करना पड़ता है। इससे छोटे व्यापारी सीजन में अपनी डिमांड के मुताबिक ग्रे कपड़ा खरीद नहीं सकते। छोटे व्यापारियों के पास पेमेंट का टर्न ओवर भी फ़ास्ट न होने से सीजन का पूरा फायदा नहीं ले पाते।

वीवर्स का धारा 90 दिन बिल टू बिल हो तो छोटा व मध्यम व्यापारी आराम से माल बनाकर बेच सकता है व रोटेशन कर वीवर्स को आसानी से पेमेंट भी कर सकता है। लेकिन वीवर्स जब भी सीजन का समय होता है, नया धारा-धोरण तय कर फ़ास्ट पेमेंट की डिमांड करने की मार छोटे व मध्यम दर्जे के व्यापारियों को पड़ती है।

सोश्यल मीडिया ग्रुप में व्यापारियों से अपील की जा रही है कि वीवर्स से कपड़ा 90 दिन की साइड में या 7 दिन में 5% लेस के धारे से ही काम करें। जो वीवर्स व्यापारी के धारे से सहमत हों उसी का कपड़ा खरीदें जिससे मार्केट का हर छोटे से छोटा व्यापारी भी अपना व्यापार शांतिपूर्ण ढंग से कर सके। छोटे व मध्यम दर्जे के व्यापारियों को नए धारे में माल खरीदने के बाद पेमेंट करने के समय परेशानी का सामना करना पड़ता है।इसलिए छोटे व्यापारी अपना सीजन का व्यापार ढंग से नहीं कर पाते।

व्यापारियों की परेशानी को देखते हुवे अपील की जा रही है कि सभी व्यापारी 90 दिन बिल टू बिल पेमेंट व 7 दिन में 5% डिस्काउंट के धारे से ही माल खरीदें।

आज सूरत के व्यापार में बहुत अधिक प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। माल खरीदने, बनाने व बेचने में सब कुछ ओपन हो चुका है। व्यापार में ग्रे खरीदी में व मील में प्रोसेस कराने में जो वटाव मिलता है वो एक प्रकार से पर्दे का काम करता है। अतः वटाव सिस्टम रहने से कुछ हद तक लागत निकालने में फ़ायदा रहता है।

– अरविंद गाड़िया

पुराने धारा-धोरण के हिसाब से ग्रे खरीदने की बात बिल्कुल वाजिब है। जब से जीएसटी लागू हुई है, विवरों ने बड़ी चतुराई से यार्न की खरीद पर चुकाई जीएसटी की क्रेडिट भी ली है और साथ ही अपनी लागत पर भी टैक्स वसूला है। जो टैक्स आगे पासऑन करना था, उसे अपनी इनकम का सोर्स बना दिया। विशेष रूप से साड़ी और ड्रेस मटीरियल की कुछ आइटम में ऐसा ही हुआ है। ऐसे में व्यापारियों को बढ़ी हुई लागत को न्यूट्रलाइज़ करने पुराने धारा-धोरण के हिसाब से काम करना शुरू करना चाहिए। दूसरा समाधान यह भी हो सकता है कि यदि वीवर अपनी तमाम लागत की गिनती कर अलग से जीएसटी वसूलने के बजाय नेट बिल दे देता है, तो भी व्यापारी को लाभ मिलेगा क्योंकि वह अपने बिल में जीएसटी जोड़कर उसकी क्रेडिट ले लेगा। इससे उलझन भी कम रहेगी।

– दिनेश कटारिया