‘नमो’ के गुजरात को आनंदीबेन का ग्रहण


गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन और दलित अत्याचार की घटना के बाद राजनीति ने करवट बदली है। राज्य में अलग-अलग समाज भाजपा से दूर होने लगा है।
ज्ञातव्य है कि 1998 में केशूभाई पटेल जब दूसरी बार मुख्यमंत्री बने तो दो साल तक पार्टी के सहयोग से अच्छा शासन किए परंतु 2001 के भूकंप के बाद भाजपा में भूकंप आ गया। माधवपुरा बैंक घोटाला, स्थानीय चुनावों में भाजपा की हार जैसे अनेक कारणों से हाईकमांड ने केशूभाई को हटा दिया था। अब आनंदीबेन के शासन को लेकर हाईकमांड दुविधा में पड़ गया है। सीनियर नेताओं का कहना है कि गुजरात में दलित अत्याचार की घटनाओं से उत्तर प्रदेश में मायावती को संजीवनी मिल गयी है। दिल्ली में संसद नहीं चल पा रही है। उत्तर प्रदेश के दलितों में रोष है।
आनंदीबेन के आते ही सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार शुरु हो गया। भ्रष्टाचार से लोग परेशान हो गए हैं। दूसरी ओर राज्य में महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है। मुख्यमंत्री सत्ता से अपनी पकड़ खोती जा रही हैं। भाजपा के ही विरोधी नेता शासन में अवरोध पैदा कर रहे हैं। पाटीदार आरक्षण आंदोलन के थमने का दावा किया जाता है इसके बावजूद हार्दिक पटेल भाजपा विरोधी बयान देकर आंदोलन को जीवंत करने की धमकी दे रहे हैं। आनंदीबेन के जमाई पर भी निशाना साधा जाने लगा है।
गुजरात में भाजपा के वोटबैंक में सेंध लगने लगी है। पहले पाटीदार भड़के हुए थे अब दलित अत्याचार के मुद्दे पर सरकार से विमुख हो रहे हैं। जानकारों का कहना है कि चुनाव आते-आते और कोई समाज सामने आ जाए तो इसमें कोई नई बात नहीं है। गुजरात में जैसे-जैसे भाजपा को नुकसान होगा वैसे-वैसे हाईकमांड की परेशानी बढ़ेगी।