महेन्द्र सिंह धोनी के ‘बलिदान बैज’ का सच


(PC : Twitter/@ShivAroor)

महेन्द्र सिंह धोनी हमेशा से कुछ अलग करने के लिये पहचाने जाते हैं।

जब क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा था तो उनके लंबे बाल उनकी पहचान बन गये थे।

पकिस्तान में एक मैच के दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने तो धोनी को यहां तक कह दिया था कि वह कभी अपने लंबे बाल नहीं कटायें।

महेन्द्र सिंह धोनी के चाहने वाले उनके जैसे बालों की स्टाईल रखने लगे। 2011 में धोनी ने भारत को दूसरी बार एकदिवसीय वर्ल्ड कप चैंपीयन बनवाया। चैंपीयनशीप के तुरंत बाद अपनी चिर-परिचित हेयर स्टाईल छोड़ कर अपना सिर मुंडवाये वर्ल्ड कप की ट्राफी पहने नजर आये।

अब 2019 के वर्ल्ड कप में उनका एक अलग ही स्टाईल स्टेटमेंट चर्चा का विषय बना हुआ है।

जी हां, बुधवार 5 जून को भारत और दक्षिण अफ्रिका के बीच वर्ल्ड कप के एक दिवसयीय मुकाबले में विकेट किपींग कर रहे महेन्द्र सिंह धोनी के दस्तानों यानि ग्लव्ज पर एक अनोखा सिम्बॉल छपा हुआ था। इस सिम्बॉल को लेकर क्रिकेट जगत और खास कर भारतीय और धोनी प्रशंसकों में कुतूहल फैल गया। लेकिन जब सच्चाई का सबको पता चला, तो चहुं ओर महेन्द्र सिंह धोनी की तारीफ होने लगी।

दरअसल, उनके ग्लव्स पर अनोखा निशान देखने को मिला, जिसे हर कोई इस्तेमाल में नहीं ला सकता.

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आपको बता दूं कि यह बैज पैरा-कमांडो लगाते हैं. इस बैज को ‘बलिदान बैज’ के नाम से जाना जाता है.

आपको बता दूं कि आखिर ये बलिदान बैज है क्या?

दरअसल, पैराशूट रेजिमेंट के विशेष बलों के पास उनके अलग बैज होते हैं, जिन्हें ‘बलिदान’ के रूप में जाना जाता है. इस बैज में ‘बलिदान’ शब्द को देवनागरी लिपि में लिखा गया है. यह बैज चांदी की धातु से बना होता है, जिसमें ऊपर की तरफ लाल प्लास्टिक का आयत होता है. यह बैज केवल पैरा-कमांडो द्वारा पहना जाता है.

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आपको याद होगा कि महेन्द्र सिंह धोनी को 2011 में वर्ल्ड कप की जीत के मौके पर प्रादेशिक सेना में मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की उपाधि दी गई थी। इससे पहले बिते जमाने के लोकप्रिय ऑलराऊंडर खिलाड़ी कपिल देव जिन्होंने भारत को पहला विश्व कप 1983 में दिलाया था, उन्हें भी यह सम्मान दिया था।

बता दें कि महेन्द्र सिंह धोनी ने 2015 में पैरा ब्रिगेड के साथ प्रशिक्षण लिया था। आगरा के पैराट्रूपर्स ट्रेनिंग स्कूल में भारतीय वायु सेना के एएन-32 विमान से 1250 फुट की ऊंचाई से पांचवी छलांग लगाकर एक मिनट से भी कम समय में मालपुरा ड्रॉपिंग जोन के पास सफलतापूर्वक उतर कर ट्रेनिंग पूरी की। इसी के बाद उन्होंने पैरा विंग्स प्रतीक चिन्ह लगाने की योग्यता प्राप्त कर ली। यानी इसी के साथ उन्होंने इस बलिदान बैज के इस्तेमान की योग्यता हासिल कर ली, जिसे उनके ग्लव्ज पर देखा गया।

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लेकिन सबसे रोचक बात यह है कि दक्षिण अफ्रिका के खिलाफ मैच में जब धोनी के ग्लव्ज पर ये सिम्बॉल नजर आया, तो उसके बाद उनके चाहने वालों ने जब धोनी की पुरानी तस्वीरें खंगालनी शुरू कीं, तो पाया कि वे तो पिछले काफी समय से इस सिम्बॉल का एक या दूसरी जगह पर उपयोग कर रहे हैं। उनके ग्लव्ज के अलावा उनकी कैप, उनके मोबाईल कवर, उनकी सूटकेस पर भी यही बलिदान बैज नजर आ रहा है।

अवश्य ही धोनी इस मानद उपाधि को गर्व के साथ धारण करके एक युवा आइकन के रूप में युवाओं को सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

आप जानते ही हैं कि धोनी ‌को पिछले वर्ष यानि 2018 में पद्म भूषण से नवाजा गया था।

भारत के इस हरफनमौला सितारे को सलाम।