योगी सरकार के लिए गले की फांस बनेगा ओबीसी को तीन हिस्सों में बांटना


17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का शिगूफा छोड़ चुकी बीजेपी के लिए अब इस सिफारिश को लागू करना आसान नहीं दिखता।
योगी सरकार के लिए सिफारिश को लागू करना आसान नहीं

लखनऊ । उत्तरप्रदेश में पिछड़ा वर्ग सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट आ चुकी है। बीजेपी ने यूपी में सत्ता में आने के बाद इस कमेटी का गठन किया था। ओबीसी के आरक्षण में पिछड़ों का हिस्सा बांटने की मांग को लेकर बीजेपी के ही मंत्री ओमप्रकाश राजभर लगातार हमलावर दिखते हैं। इस मुद्दे को वे बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भी सामने उठा चुके हैं। वहीं अपना दल (एस) भी आरक्षण बंटवारे को लेकर मुखालफत करती दिख रही है। दूसरी तरफ 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का शिगूफा छोड़ चुकी बीजेपी के लिए अब इस सिफारिश को लागू करना आसान नहीं दिखता।

दरअसल, सरकारें पूर्वाग्रहों के आधार पर ही बनती और बिगड़ती हैं। 2014 में एक देश में बदलाव का पूर्वाग्रह बना। जिसके बाद दलित, पिछड़े व सवर्ण सभी एक मंच पर आए और केंद्र में और उसके बाद राज्य दोनों जगह दो तिहाई बहुमत से सरकार में आई। लोगों की अपेक्षाएं भी इस सरकार से उतनी ही ज्यादा रहीं। यही कारण था कि एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दलित सड़क पर उतरे तो सरकार को उनके पक्ष में उतरना पड़ा। अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बदलना पड़ा। जिसके बाद सवर्ण मोदी सरकार की खिलाफत करने लगे। इसके बाद बीजेपी सरकार में मंत्री ओमप्रकाश राजभर हर मंच से पिछड़ों के कोटा में कोटा करने की बात करने लगे। जिसके बाद सरकार को रिटायर्ड जज राघवेंद्र कुमार की अध्यक्षता में कमेटी गठित करनी पड़ी। कमेटी में पूर्व नौकरशाह जेपी विश्वकर्मा, बीएचयू के अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भुपेंद्र सिंह और सीनियर एडवोकेट अशोक राजभर भी शामिल रहे। इस मामले में रिपोर्ट आ चुकी हैं रिपोर्ट में कहा गया है कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को तीन समान भागों में बांट दिया जाए। इसके तहत पिछड़ा, अति पिछड़ा और सर्वाधिक पिछड़ा वर्ग बनाने की सिफारिश की गई है।

मामले में डिप्टी सीएम केशव मौर्य कहते हैं कि अभी समिति की सिफारिशों का अध्ययन हो रहा है। जिसमें सबका उत्थान हो, सबका विकास हो और सर्वसमाज को सम्मान मिले उसके लिए केंद्र सरकार ने कमेटी गठित की थी। उसकी रिपोर्ट आ गई है। यह सिफारिश स्वागत योग्य है। अभी इस पर अध्ययन चल रहा है जो भी सरकार फैसला लेगी उससे मीडिया को अवगत कराया जाएगा। उत्तर प्रदेश में लगभग 234 पिछड़ी जातियां हैं, जिन्हें तीन हिस्सों में बांटने की सिफारिश की गई है। पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा और सर्वाधिक पिछड़ा। पिछड़े वर्ग में सबसे कम जातियों को रखने की सिफारिश की गई है, जिसमें यादव, कुर्मी जैसी संपन्न जातियां हैं। अति पिछड़े में वे जातियां हैं जो कृषक या दस्तकार हैं और सर्वाधिक पिछड़े में उन जातियों को ऱखा गया है, जो पूर्णरुपेण भूमिहीन,गैरदस्तकार, अकुशल श्रमिक हैं। इस तरह से विश्लेषण कर रिपोर्ट सरकार को सौंपी गई है। अब इस रिपोर्ट को लेकर बीजेपी के सहयोगी दल से मंत्री ओमप्रकाश राजभर सबसे ज्यादा उत्साहित होकर लागू कराने की मांग कर रहे हैं। राजभर ने कहा कि इस सरकार को जल्द से जल्द लागू कर दे। राजभर ने सिफारिशों को लागू न करने पर धरने पर बैठने की चेतवानी भी दी है।

उधर एक अन्य सहयोगी पार्टी अपना दल (एस) का कहना है कि जातिगत जनगणना के आधार पर जिसकी जितनी हिस्सेदारी हो उसी अनुपात में उसकी भागीदारी होनी चाहिए। अपना दल (एस) के प्रदेश अध्यक्ष बृजेन्द्र प्रताप सिंह का कहना है कि उनकी पार्टी की लाइन यही है कि हिस्सेदारी के अनुपात में ही भागीदारी होनी चाहिए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हमारी पार्टी के लाइन को समझते हुए ही कदम उठाएंगे।

इससे पहले 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल करने का वादा अभी तक पूरा नहीं हुआ है। इसमें निषाद, बिंद, मल्लाह, केवट, कश्यप, भर, धीवर बाथम, मछुआरा, प्रजापति, राजभर, कुम्हार, धीमर मांझी, तुरहा जैसी जातियां थीं। सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट में इन जातियों को सर्वाधिक पिछड़ों की कैटेगरी में रखने की सिफारिश की गई है। इससे साफ है कि एक बार फिर वोट बैंक की फिक्रमंद राजनीतिक दलों के पास अपने-अपने एजेंडे हैं। योगी सरकार के इस फैसले को यूपी में समाजवादी पार्टी और बीएसपी के 2019 के लिए बनने वाले संभावित गठबंधन के तोड़ के रुप में देखा जा रहा है। लेकिन ऐसी कोशिश तब भी की गई थी, जब राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे और असफलता हाथ लगी थी। अब देखना होगा कि बीजेपी किस तरह इस हथकंडे का राजनीतिक इस्तेमाल कर पाती हैं और अपने सहयोगी दलों की आकांक्षाओं और विरोध को कैसे शांत कर पाती है।

– ईएमएस