आदिवासी बहुल उदयपुर संभाग में ‘नोटा’ बिगाड़ सकता है बीजेपी व कांग्रेस के समीकरण


अपनी पसंद का उम्मीदवार नहीं होने पर 'नोटा' का विकल्प इस्तेमाल करने का ट्रेंड चुनाव में लगातार बढ़ रहा है।

जयपुर। अपनी पसंद का उम्मीदवार नहीं होने पर ‘नोटा‘ का विकल्प इस्तेमाल करने का ट्रेंड चुनाव में लगातार बढ़ रहा है। चुनाव दर चुनाव मतदाताओं में नोटा को लेकर सक्रियता बढ़ रही है। राजस्थान के आदिवासी बहुल इलाके में नोटा बीजेपी और कांग्रेस के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। यह वह इलाका है जहां बीजेपी व कांग्रेस हर बार आदिवासियों के विकास के नाम बड़े दांव खेलती है।

विधानसभा चुनाव-2013 के आंकड़ों पर अगर नजर डालें तो प्रदेशभर में 1.90 फीसदी वोट नोटा को पड़े थे। कुल 3 करोड़ 9 लाख वोटों में से 589923 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। इनमें मतदाताओं ने एसएसी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों पर ही नोटा का बटन ज्यादा दबाया।

जनजाति बहुल डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और उदयपुर के आदिवासी बहुल आरक्षित सीटों पर 2.5 फीसदी से लेकर 5 फीसदी तक वोट नोटा को मिले। आदिवासी बहुल डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ की सभी विधानसभा सीटें और उदयपुर की आठ में से पांच सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों पर नोटा के ज्यादा इस्तेमाल के पीछे गैर आदिवासियों के समता आंदोलन को कारण बताया गया। समता आंदोलन सामान्य और ओबीसी को अधिकार दिलाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहा है।

प्रदेश में विधानसभा की 200 सीटों में से 34 सीट ​एससी और 25 सीट एसटी के लिए आरक्षित हैं। एससी-एसटी की कुल 59 आरक्षित सीटों में से 35 सीट ऐसी रही जिन पर नोटा को 2 फीसदी से लेकर 5 फीसदी तक वोट मिले। आरक्षित सीटों पर नोटा के बढ़ते उपयोग ने राजनीतिक दलों और विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर ​कर दिया है। फिलहाल नोटा को परिणाम में शामिल नहीं किया जाता, लेकिन नोटा कई उम्मीदवारों के समीकरण जरूर बिगाड़ रहा है।

– ईएमएस