पर्रिकर के जाने के बाद गोवा के लिए भाजपा की क्या रणनीति


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गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद गोवा सरकार को बचाने के लिए केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी गोवा रवाना हो गए हैं। यूं तो नितिन गडकरी की रवानगी का मकसद पर्रिकर के अंतिम संस्कार में शामिल होने को बताया जा रहा है, किंतु उसके कुछ सियासी अर्थ भी हैं।

पिछली बार जब गोवा सरकार का गठन किया गया था उस समय मनोहर पर्रिकर के साथ-साथ नितिन गडकरी ने सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई थी और रातों-रात कांग्रेस को दरकिनार कर भाजपा की सरकार बनवाई थी। उस समय कांग्रेस सबसे बड़ा राजनीतिक दल था, लेकिन कुछ छोटी पार्टियों और निर्दलीय आदि के समर्थन से गडकरी ने राज्यपाल को चुनाव बाद हुए गठबंधन को सरकार बनाने के आमंत्रण के लिए राजी कर लिया और कांग्रेस सरकार बनाने पहुंचे दिग्विजय सिंह देखते रह गए।

मनोहर पर्रिकर निधन के बाद गोवा में जो हालात बने हैं उन्हें देखते हुए आगामी परिदृश्य का अनुमान लगाना कठिन हो रहा है। पर्रिकर ने किसी तरह सरकार को संभाला हुआ था लेकिन अब मुश्किल हो सकती है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा एक और राज्य को खोने का जोखिम नहीं लेना चाहती, इसलिए गडकरी को तैनात किया गया है। इसे पहले यह भी खबर आई थी कि कभी भाजपा में रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिगंबर कामत को पुनः भाजपा में लाकर मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन कामत ने इन खबरों को अफवाह बताते हुए भाजपा के साथ किसी तरह की बातचीत से साफ इंकार किया है।

गोवा में विधानसभा की 40 सीटें हैं जिनमें से 3 सीटों पर उपचुनाव होना है इस तरह सदन की संख्या घटकर 37 रह गई है और बहुमत के लिए 19 सीटों की आवश्यकता है। पर्रिकर के निधन के बाद भी भाजपा को 19 विधायकों की आवश्यकता पड़ेगी। कांग्रेस के पास 14 विधायक हैं जबकि भाजपा के पास 12 विधायक ही हैं। अब देखना यह है कि गडकरी किस तरह भाजपा को मजबूत स्थिति में लाते हैं।