जेएनयू विवाद से सुर्खियों में आये कन्हैया कुमार के राजनीतिक जीवन की शुरूआत हार से


फाईल तस्वीर। (Photo Credit : inkhabar.com)

दिल्ली के जेएनयू में विगत वर्षों में हुए विवाद के बाद राजनीतिक सुर्खियों में आये युवा नेता कन्हैया कुमार का राजनीतिक जीवन हार के साथ शुरू हुआ है। कन्हैया कुमार बिहार की बेगुसराई लोकसभा सीट से सीपीएम के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे थे। उनका मुकाबला भाजपा के तेज तर्रार और हमेशा अपने बयानों के कारण विवादों में रहने वाले गिरिराज सिंह व राष्ट्रीय जनता दल के तनवरी हुसैन के साथ था।

रूझानों से स्पष्ट है कि भाजपा के गिरिराज सिंह ने साढ़े तीन लाख वोटो की विजयी बढ़त बना ली है। कन्हैया कुमार दूसरे और राजद के तनवीर हसन तीसरे क्रम पर रहे। चुनावी गणित पर गौर करें तो दोनों विपक्षी उम्मीदवारों को प्राप्त मतों को जोड़ भी लें तो भी भाजपा के गिरिराज सिंह कहीं आगे हैं। यह दिखा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी की लहर इतनी तेज रही कि सारे विरोधी एक साथ हो जाते तो भी उन्हें परास्त करना संभव नहीं था।

कन्हैया कुमार को लेकर मीडिया में भी काफी चर्चा थी। कथित लिबरल वर्ग उन्हें एक ऐसे युवा चेहरे के रुप में देखता था जिसे संसद के अंदर होना चाहिये और समाज के दबे-कुचले वर्ग की आवाज बनना चाहिये। लेकिन सच्चाई यह है कि टीवी‌ डिबेट में बहस करना एक चीज है और जमीनी स्तर पर लोगों का समर्थन जुटा कर वोट हासिल करके संसद में पहुंचना अलग बात है।

ऐसे में कहना होगा ‌कि कन्हैया कुमार जैसे अपनी अलग सोच रखने वाले युवाओं को भी चुनावी राजनीति को समझने में अभी वक्त लगेगा। हो सकता है इस चुनाव में मिली हार का वे आकलन करेंगे और उसके अनुसार अपने भविष्य की योजनाओं को आकार देंगे। अभी वास्तविकता तो यही है कि केवल प्रधानमंत्री मोदी को हर बात के लिये कटघरे में खड़ा करना जनता को रास नहीं आ रहा है।