खतरे का संकेत हो सकती है केरल में बाढ़ के बाद बड़ी संख्या में केचुओं की मौत


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कोझिकोड। केरल में बाढ़ से फसल चौपट होने के बाद अब एक नई मुसीबत से किसान आशंकित हो उठे हैं। वयनाड और इडुक्की जिलों के कई गांवों में बड़ी संख्या में केचुओं के मरने के मामले सामने आ रहे हैं। इससे खेतों की मिट्टी को काफी नुकसान हो सकता है। इसके साथ ही केचुओं की मौत इस ओर भी इशारा करती है कि बाढ़ से मिट्टी की क्वॉलिटी में कितना फर्क आ गया है।

वयनाड जिले के कोलावयल के किसान सनमति राज ने पिछले सप्ताह अपने खेत में बड़ी संख्या में मरे हुए केचुएं देखे। उन्होंने बताया कि बारिश के समय उनका मिट्टी से बाहर आना आम बात है, लेकिन बाढ़ के बाद से मौसम सूखा है। ऐसे में केचुएं के होने से आशंका होती है।

वैज्ञानिक और राज्य सरकार इस बात को लेकर चिंता में हैं क्योंकि केचुओं की पर्याप्त संख्या से मिट्टी में उर्वरता बनी रहती है और बाढ़ के ठीक के बाद उनकी मौतें आने वाले खतरे की घंटी हो सकती हैं। इससे पहले इतनी बड़ी संख्या में केचुओं के मरने की घटना 2016 में गर्मी के मौसम में वयनाड में देखने में आई थी। तब मिट्टी के ज्यादा तापमान की वजह से ऐसा हुआ था।

वहीं, इस बार बाढ़ के जाने के बाद दिन का तापमान 21 अगस्त को 22 डिग्री से गुरुवार को 29.4 डिग्री हो गया था। एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर डायरेक्टर एन अनिल कुमार ने बताया कि भारत में केचुएं 15 से 28 डिग्री तक तापमान सहन कर सकते हैं।

बताया गया है कि तापमान के अलावा बाढ़ के बाद मिट्टी में हुआ बदलाव भी केचुओं के मरने का कारण हो सकता है। एक टन मिट्टी में 5 किलो ऑर्गैनिक मैटर और 50 लीटर पानी होता है, लेकिन बाढ़ के पानी के साथ ऑर्गैनिक मैटर बह गया जिस कारण मिट्टी में पानी रुकना बंद हो गया। सूखी मिट्टी के गर्म होने से केचुएं बाहर आने लगे। महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी के एस प्रसांथ नारायण ने बताया कि शुरुआती रिपोर्टों में पता चला है कि वयनाड के केचुओं की मौत शायद दिन-रात के तापमान में अंतर और मिट्टी के सूखने के कारण हुई है, जबकि इडुक्की में भूस्खलन की वजह से हुए वाइब्रेशन से भी बड़ी संख्या में केचुओं की मौत हुई है।

(ईएमएस)