विश्व पुस्तक दिवस : महज नौ साल की उम्र में सूरत के इस बच्चे ने बना लिया खुद का पुस्तकालय

(Photo Credit : gujaratmitra.in)

दूसरों को पुस्तकालय से किताबें किराए पर पढ़ने के लिए देता है, लोगों से पुस्तक पढ़ने के लिए लेता हैं शुल्क

किताब पढ़ना अच्छी आदतों में से एक हैं। हर वर्ग के लोगों को किताब अवश्य पढ़नी चाहिए पर अधिकांशतः देखा गया हैं कि आज की युवा पीढ़ी मोबाइल और कंप्यूटर के दीवाने हैं और किताबों से दूर भागते हैं। इस पर आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे शख्स की जो पढ़ने की दुनिया में लगभग अकल्पनीय है। हम एक छोटे बच्चे के बारे में बात कर रहे हैं जिनकी उम्र महज नौ साल है। नौ साल के इस बच्चे में पढ़ाई को लेकर जुनून इस हदतक हैं कि इस बच्चे का अपना एक निजी पुस्तकालय बन चुका है।
आपको बता दें कि सूरत के सिटीलाइट इलाके में रहने वाले नौ साल के वेदांत बियाणी का अपना निजी पुस्तकालय है। नौ साल के वेदांत का कहना है कि उनकी लाइब्रेरी में कई किताबें हैं। उसे पढ़ने का बहुत शौक है और जब भी उसे समय मिलता है, वह पढ़ता है।  वह अपने पुस्तकालय के सदस्यों से प्रति सप्ताह 20 रुपये शुल्क भी लेता हैं। सूरत के ताप्तीवेली स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची की मां एक बैंकर निवेश सलाहकार है और उसके पिता कपड़ा व्यवसाय से जुड़े हैं।  वेदांत की मां सोनल बियाणी का कहना है कि उनके बेटे का शौक स्वाभाविक है। चूंकि उन्हें पढ़ने का बहुत शौक है, इसलिए वेदांत को यह शौक विरासत में मिला है। वेदांत को पढ़ने में दिलचस्पी हो गई और उन्होंने खुद ही किताबें पढ़ना शुरू कर दिया। पुस्तकालय चलाने का विचार उन्हें कोरोना के समय में आया था। उन्हें लगा कि कोरोना में लोगों के पास टाइम पास करने का कोई जरिया नहीं है।विशेष रूप से गरीब बच्चों को भी पढ़ना चाहिए इसलिए उन्होंने इस पुस्तकालय की शुरुआत की और पढ़ने के अपने शौक के कारण उन्हें जन्मदिन के उपहार के रूप में किताबें भी मिलती हैं इससे उनका पुस्तक संग्रह बढ़ गया है जो अब एक पुस्तकालय का रूप ले चुका है।
आमतौर पर जब किसी बच्चे की आय कम होती है तो वह खिलौने, चॉकलेट या अन्य पसंदीदा चीजें खरीदना चाहता है।  लेकिन वेदांत ने 20 रुपये में अपने द्वारा स्थापित पुस्तकालय से किताबें किराए पर दूसरों को पढ़ने के लिए देता हैं, और अपनी कमाई से वह अपने दादा के साथ जाता है और लाइफ बॉय साबुन खरीदकर गरीबों को देता है।  इतनी कम उम्र में इस तरह के विचार को पढ़ने के शौक को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

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