सूरत : जानें टेक्सटाईल्स पर जीएसटी 5% से 12% करने के मायने

प्रतिकात्मक तस्वीर (Photo Credit : rvv.co.in)

सबसे बड़ा सवाल : इन्वेर्टेड ड्युटी स्ट्रक्चर की समस्या झेल रहे 15% टैक्सटाईल सैक्टर को राहत दिलाने में शेष 85% टैक्सटाईल सैक्टर को क्यों परेशानी में डाला जा रहा?

क्या 31 दिसंबर की रात तक जीएसटी दर 5% पर ही कायम रखने का निर्णय सरकार करेगी?
1 जनवरी से टेक्सटाईल वैल्यू चैइन के सभी उत्पादों पर जीएसटी की दर पांच से बारह प्रतिशत होने जा रही है। वैसे सूरत सहित देश भर के कपड़ा व्यापारी जीएसटी काउंसिल के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं और आंदोलन की सुगबुगाहट भी है। सूरत के कपड़ा व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन फोस्टा ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सहित आला अधिकारियों के सामने इस संबंध में गुहार भी लगाई है। लेकिन सरकारी हवाले से संकेत ऐसे ही मिल रहे हैं कि व्यापारियों की जीसटी दर पांच प्रतिशत कायम रखने की मांग को दरकिनार किया जा सकता है। यदि 31 दिसंबर तक सरकार की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आता है, तो 18 नवंबर के दिन का जीएसटी दर का बारह प्रतिशत करने का नोटिफिकेशन 1 जनवरी से स्वतः लागू हो जायेगा। इस संभावना के मद्देनजर देशभर में कपड़ा व्यापारी संशय में हैं।
वैसे इस पूरे मामले में सरकारी पक्ष पर गौर करना भी जरूरी है। टैक्सटाईल्स की समग्र वैल्यू चेइन के कुछ घटक ऐसे हैं जो इन्वर्टेड ड्युटी स्ट्रक्चर के संबंध में दिक्कतों का सामना कर रहे हैं। इन्वर्टेड ड्युटी स्ट्रक्चर वो बला है जब इनपुट और रॉ-मटीरियल्स पर टैक्स आऊटपुट या फायनल प्रोड्क्ट पर नीहित टैक्स से अधिक हो जाता है। कारोबारियों को रॉ-मटीरियल्स पर अधिक टैक्स देना पड़ता है और फायनल प्रोडक्ट पर टैक्स कम होता है। ऐसे में सरकार को बाद में ये अतिरिक्त टैक्स का रिफंड करना पड़ता है। बता दें कि जीएसटी काउं‌सिल ने कई उद्योगों के संबंध में इन्वेर्टेड ड्युटी स्ट्रक्चर की समस्या का निदान किया है। लेकिन टेक्सटाईल्स, फूटवेयर, फार्मास्युटिकल और फर्टिलाइजर इंडस्ट्री में इन्वर्टेड ड्युटी स्ट्रक्चर की समस्या अभी भी बनी हुई है। कारोबारियों के लिये इस अतिरिक्त टैक्स के रिफंड की समस्या काफी समय से लंबित है।
मनी कंट्रोल की एक रिपोर्ट में कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाईल इंडस्ट्री के चेरमेन संजय जैन के हवाले से बताया गया है कि टैक्सटाईल उद्योग में जिनमें मेनमेड फायबर और यार्न सैक्टर प्रमुख है - इन्वेर्टेड ड्युटी स्ट्रक्चर की इस समस्या से ग्रस्त हैं। लेकिन कपड़ा कारोबारी ये समझ नहीं पा रहे हैं कि इंडस्ट्री की 15% प्रभावितों की समस्या को सुलझाने के लिये सरकार शेष 85% सैक्टर को क्यों तकलीफ में डालना चाह रही है?
प्रतिकात्मक तस्वीर
कपड़ा उद्योग के जानकारों का मानना है कि जीएसटी में वृद्धि से छोटे, मझौले और मध्यम स्तर के उद्योगों को वर्किंग कैपिटल के दबाव से जूझना पड़ सकता है। जानकार यह आशंका भी जता रहे हैं कि जीएसटी दर  में प्रस्तावित बदलाव लाखों MSME उद्यमियों को असंगठित क्षेत्र में धकेल सकता है या अस्तित्व का संकट भी ला सकता है। इस संबंध में भारत चैंबर ऑफ कोमर्स के उपाध्यक्ष अशोक तोदी का कहना है कि समान टैक्स की दर ऐसे उद्यमी जो गैर-लक्जरी/गैर-प्रीमियम वस्तुओं का उत्पादन करते हैं, को कारोबार में टिके रहने में दिक्कत पैदा कर सकती है क्योंकि कीमत के आधार पर टैक्स की दर में जो अंतर था, वह इस वर्ग के कारोबारियों के लिये संजीवनी समान था।
उधर कपड़ा विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि जीएसटी दर में बदलाव के कारण समग्र कड़ी का आखिरी छोर यानि ग्राहक के लिये उत्पाद महंगे हो जायेंगे क्योंकि उद्यमी इस बढ़ने वाली लागत को स्वयं अवशोषित नहीं कर पायेंगे। छोटे कारोबारी पहले से ही कोरोना की दो लहरों के दौरान हुई आर्थिक क्षति और कच्चे माल की लागत में वृद्धि से प्रभावित हैं।
एक अनुमान के अनुसार टैक्सटाईल वैल्यू चेन पर जीएसटी की दर में वृद्धि से सरकार को 7 से 8 हजार करोड़ रूपये अतिरिक्त राजस्व की प्राप्ति होगी। सरकार की जीएसटी से औसत मासिक राजस्व 1.25 लाख के आसपास है और ये 7 से 8 हजार करोड़ की वृद्धि से सरकार का तुलनात्मक दृष्टि से उतना लाभ नहीं होगा जितना देश में रोजगार के अवसर प्रदान करने के मामले में दूसरे नंबर पर रहे कपड़ा उद्योग से जुड़े लोगों को आर्थिक दबाव झेलना पड़ेगा। यह आशंका भी जताई जा रही है कि टैक्स में वृद्धि के इस घटनाक्रम से बड़ी संख्या में रोजगार के अवसरों पर प्रतिकुल प्रभाव भी पड़ सकता है।
खैर, अभी एक जनवरी में चंद दिनों का समय शेष है। सूरत के कपड़ा अग्रणी सरकार में पेशकश कर चुके हैं और उम्मीद लगा रहे हैं कि 31 दिसंबर की रात तक सरकार कपड़ा कारोबारियों कर दिक्कतों के प्रति नरम रुख अपनाते हुए 5 प्रतिशत की दर ही कायम रखेगी।

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