व्यापारी भले कोस रहे, लेकिन सूरत के कपड़ा मार्केट खुलवाना फोस्टा के हाथों में थोड़े ही है!

रिंग रोड़ स्थित सूरत टेक्सटाइल मार्केट का प्रवेश द्वार। (File Photo)

नियंत्रणों की आड़ में अघोषित लॉकडाउन लागू है तो सरकार के विरुद्ध कौन सी संस्था जा सकती है?

कोरोना महामारी के दूसरी लहर की घातक असरों के बीच गुजरात में 17 मई तक रात्रि कर्फ्यू लागू है और दिन के समय में भी व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सरकार ने बंद रखने का आदेश दे रखा है। आवश्यक चीज-वस्तुओं की दुकानें और मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री को मर्यादित ढंग से चालू रखा गया है। इसी क्रम में सूरत की आर्थिक गतिविधि का महत्वपूर्ण घटक कपड़ा उद्योग इन दिनों बंद है। विशेष रूप से शहर के सभी कपड़ा मार्केट बंद हैं। व्यापारियों में इस बंदी को लेकर मिली-जुली राय है।
कपड़ा मार्केटों के सबसे बड़े और स्वीकार्य संगठन फोस्टा ने जहां स्थानीय पुलिस और पालिका प्रशासन के निर्देश पर मार्केट बंद रखने का समर्थन किया है, वहीं छुटपुट छोटे व्यापारी संगठन या कपड़ा उद्योग के मामलों में नये-नये सक्रिय हुए चैंबर ऑफ कोमर्स के कर्ताधर्ताओं ने कपड़ा मार्केटों में दिन में कुछ घंटे चालू रखने की दिशा में प्रशासन में मांग रखने के प्रयास किये हैं। 
फोस्टा हमेशा से प्रशासन की नीति के अनुकूल होकर चला है। वैसे उसके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। अन्य किसी के भी सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है। जब सरकार ने राज्य स्तर पर ही अघोषित लॉकडाउन लगा रखा है, और प्रदेश में महामारी का कहर कितना घातक रहा है, ये हर कोई जानता है, तो सरकार के सामने आवाज उठाने का तो प्रश्न ही नहीं। जिस प्रकार से शहरों और गांवों में कोरोना ने कई परिवारों को लीला है, दो-चार सप्ताहों की बंदी लाजिमी भी है। 
कपड़ा मार्केटों में राजनीति की रोटियां सेकने वाले या अपने वजूद या मजे के लिये फोस्टा की आलोचना करने वाले केवल बोल-बच्चन तक ही सीमित हैं। पिछले कुछ दिनों से ये सुगबुगाहट हो रही है कि मार्केटों को दिन में तीन-चार घंटे चालू रखा जाए जिससे कारोबारी दस्तावेजी काम, बैकिंग काम, एक्सपोर्ट के काम पूरे कर सकें। वहीं कुछेक की ये राय है कि जब दिसावरी में मंडियां बंद हैं तो वहां से कोई पेमेंट तो आनी नहीं है, नई बिक्री कोई होनी नहीं है, माल की डिलीवरी का माहौल नहीं है तो दुकानें चंद घंटों के लिये खोलने का कोई औचित्य नहीं है।
रात्रि कर्फ्यु के कारण टेक्सटाईल मार्केटों समय में परिवर्तन किया गया
वहीं फोस्टा के विरुद्ध में जाने का एक प्रयास ये भी उभरता दिख रहा है कि विभिन्न मार्केट एसोसियेशन अपने-अपने स्तर पर पुलिस और पालिका प्रशासन के समक्ष अपने-अपने मार्केट खोलने के लिये पेशकश करें। यानि विभिन्न मार्केटों को फोस्टा के एक छत्र के नीचे से हटाकर अलग-अलग बांट दें। सौ से ऊपर कपड़ा मार्केट क्या इस प्रकार अलग-अलग प्रशासन के सामने जायेंगे? क्या प्रशासन इतने सारे प्रतिनिधियों को सुनेगा या ये व्यावहारिक होगा? 
मान लें कि मार्केटों को कुछ घंटों के लिये खोलने की हो रही मांग जायज भी हो, तो भी ये किसने कहा कि मांग कर देने मात्र से प्रशासन हरी झंडी देगा? केवल कपड़ा मार्केट की मांगों और सहुलियतों को देखकर तो महामारी काल में नीतियां नहीं बना करतीं। सरकार की पहली प्राथमिकता लोगों की जान बचाने की होती है और कितनी ही पेशकश कर लो, बाजार तो तब ही खुलेंगे जब गांधीनगर से रात्रि कर्फ्यू में ढील होगी और कोरोना के मामले कम होने पर दिन के समय में व्यावसायिक कामकाज को गति प्रदान करने का निर्णय प्रदेश की कोरोना मसलों पर फैसले करने वाली कोर कमिटी ले पायेगी।
पिछले दो सप्ताह में लगाई गई बंदी का असर हुआ भी है। कोरोना के मामले कम हुए हैं। लेकिन इतने भी कम नहीं हुए कि लोग स्थिति सामान्य समझने लगें। सूरत में वर्तमान में 800 के आसपास दैनिक मामले आ रहे हैं। ये प्रति दिन 2000 मामलों से अवश्य कम हैं, लेकिन पहली लहर के दौरान सूरत में रोजाना अधिकतम 200-250 के बीच मामले आया करते थे। यानि वर्तमान 800 कोरोना के नये मामले, पहली लहर के दैनिक आंकड़ों से ज्यादा ही हैं। इतना ही नहीं कोरोना की दूसरी लहर में दिख रहा वायरस का वैरिएंट पहली लहर से ज्यादा घातक है।
ऐसे में स्थिति की पूरी समीक्षा के बाद सरकार ही जनहित में फैसला लेगी कि कब से नियंत्रणों में ढील देनी है। कब से कपड़ा मार्केटों को आंशिक या पूर्णकालीक रूप से खोलना है। ये फैसला करवाना फोस्टा या और किसी भी संगठन के हाथों में नहीं है। किसी के भी चाहने या न चाहने से कुछ होने वाला नहीं है। भले ज्ञापन या पत्र देने की कोई कितनी ही औपचारिकता निभाता रहे।

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