क्या आप जानते हैं महात्मा गांधी भी क्रिकेट के शौकीन थे और स्कूली दिनों में क्रिकेट टीम के कप्तान भी, जानिये ये रोचक किस्सा

पोरबंदर में रहने के दौरान बचपन में स्कूल के प्रधानचार्य की तरफ से एक खेल खेलना अनिवार्य कर दिए जाने पर उन्होंने क्रिकेट में हाथ आजमाया, भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी घरेलू ट्रॉफी का नाम जिन महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर रणजी ट्रॉफी कहा जाता है, वो राजकोट में पढ़ाई के दौरान बापू के रूम मेट रहे थे

इस समय भारत और दक्षिण अफ्रीक के बीच टी20 सीरीज चल रही है। इस सीरीज का चौथा मैच आज राजकोट में खेला जायेगा। इसके लिए दोनों ही क्रिकेट टीम मैच के लिए राजकोट पहुंच गई है। इससे पहले हम आपको क्रिकेट की दुनिया से जुड़ा एक किस्सा सुनाते है। बात ये है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जिसे हम प्यार से 'बापू' बुलाते हैं, उनको क्रिकेट से काफी लगाव था। वह सिर्फ इसकी बारिकियों से वाकिफ ही नहीं थे बल्कि बचपन में क्रिकेट खेलते भी थे। प्रसिद्ध क्रिकेटर जामरांजी और जाम रणजी की टीम को गांधीजी की टीम ने राजकोट की धरती पर आउट किया।
गांधी भले ही देखने में पतले-दुबले शरीर के लगते थे, लेकिन वास्तव में वे बेहद मजबूत थे। हालांकि उन्हें शारीरिक मेहनत करना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन पोरबंदर में रहने के दौरान बचपन में स्कूल के प्रधानचार्य की तरफ से एक खेल खेलना अनिवार्य कर दिए जाने पर उन्होंने क्रिकेट में हाथ आजमाया। उनके एक दोस्त शेख महताब ने उन्हें एक बार गेंदबाजी करने के लिए कहा। गांधी ने दौड़ लगाई और गेंद फेंकी तो तीनों विकेट एक साथ उखड़ गए। इससे चर्चित हुए गांधी जी को इसके बाद सभी अपनी टीम में रखना चाहते थे। हालांकि उनके ऊपर लिखी एक अन्य किताब में उनके एक अन्य सहपाठी रतीलाल गेलाभाई मेहता के हवाले से बापू को गेंदबाज के साथ ही एक बेहतरीन बल्लेबाज भी बताया गया था। हालांकि उनका क्रिकेट खेलना बैरिस्टरी पढ़ने के दौरान खत्म हो गया। भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी घरेलू ट्रॉफी का नाम जिन महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर रणजी ट्रॉफी कहा जाता है, वो राजकोट में पढ़ाई के दौरान बापू के रूम मेट रहे थे। रणजीत सिंह बाद में पढ़ाई के लिए लंदन चले गए, जहां उन्होंने क्रिकेट भी जमकर खेली और अंग्रेजों का मन मोहकर इंग्लैंड की क्रिकेट टीम में भी जगह बनाई। 
दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के बीज के बोए गए थे। गांधीजी को एक छात्र के रूप में क्रिकेट से विशेष लगाव था। कनाडा के प्रमुख इतिहासकार प्रो जेआर वाघासिया के अनुसार, 16 दिसंबर 1885 को राजकुमार कॉलेज, राजकोट और अल्फ्रेड हाई स्कूल के बीच क्रिकेट मैच खेला गया। राजकुमार कॉलेज क्रिकेट टीम के कप्तान जाम रणजीत सिंहजी (प्रिंस रणजी) थे और अल्फ्रेड हाई स्कूल क्रिकेट टीम के कप्तान मोहनदास करमचंद गांधी (महात्मा गांधी) थे। वे उस समय राजकोट में रह रहे थे। उस समय उनकी आयु 16 वर्ष थी! प्रिंस कॉलेज के प्रिंसिपल चेस्टर मैकनॉटन दोनों टीमों के रेफरी थे। 
मोहनदास की टीम ने पहली पारी में 168 रन बनाए। जिसमें मोहनदास ने अपने ही खाते में पांच रन बनाए। दूसरी पारी में जाम रणजी की टीम ने नौ विकेट के नुकसान पर 167 रन बनाए। और मैच जीतने के लिए 2 रन चाहिए थे, दो रन लेने के लिए क्रिकेट की जंग दिलचस्प हो गई। इस बार जाम रणजी और लास्ट बैट्समैन बिल खेलने आए। बिल को गांधीजी के खिलाफ बल्लेबाजी करनी पड़ी। गांधीजी गेंदबाजी में भी एक चतुर गेंदबाज थे। गांधीजी ने धीमी लेग ब्रेक गेंद फेंकने की दौड़ शुरू की, मोहनदास के गेंद फेंकने से पहले ही जाम रणजी ने एक रन बनाने के लिए क्रीज छोड़ दी! उस समय चतुर मोहनदास ने गेंद फेंकने की बजाय नॉन-स्टिकर का छोर उड़ा दिया। और जोरदार अपील की। वहीं रंजीत सिंह रन आउट हो गए। अंपायर की राय थी कि मोहनदास ने क्रिकेट के नियमों का पालन किया था। परिणामस्वरूप मोहनदास की टीम को विजेता घोषित किया गया। इस मौके पर प्रिंस जैम रणजी ने अपने दोस्त चार्ली को एक लेटर लिखा है। उस समय अंपायर ने इस तरह से फैसला सुनाया कि क्रिकेट के खेल का दिल खतरे में न पड़े।प्रतिद्वंद्वी जाम रणजी और राजकुमार कॉलेज की टीम ने अपने कॉलेज के प्रिंसिपल रेफरी के फैसले को खेल भावना के साथ स्वीकार किया। 

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