मौत की सजा पाए दोषी की मानसिक बीमारी फांसी से बचाव का आधार: सुप्रीम कोर्ट


सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए लोगों के लिए आशा की एक उम्मीद जगाई कि जो दोषी ठहराए जाने के बाद मानसिक बीमारी का शिकार हो गए हैं।

नई दिल्ली। एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए लोगों के लिए आशा की एक उम्मीद जगाई कि जो दोषी ठहराए जाने के बाद मानसिक बीमारी का शिकार हो गए हैं। जस्टिस एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि मौत की सजा पाए व्यक्ति के स्वास्थ्य स्थिति अब अपीलीय कोर्ट के लिए उसे फांसी की सजा घटाने का कारक होगा। तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस एमएम शांतागौदर और जस्टिस इंदिरा बनर्जी भी शामिल थीं। पीठ ने कहा कि अभियुक्त अब आपराधिक अभियोजन से बचने के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत ‘विधिसम्मत पागलपन’ की याचिका दे सकते हैं।

साथ ही बचाव पक्ष अपराध के वक्त से इसे जोड़ सकते हैं। पीठ ने दोषी ठहराए गए कैदी की फांसी की सजा से राहत दे दी। अपनी मानसिक स्थिति के कारण वह वारदात के अंजाम को जान नहीं सका। महाराष्ट्र में १९९९ में अपनी दो नाबालिग चचेरी बहनों के साथ बर्बर दुष्कर्म और हत्या के अपराध में उसे फांसी की सजा सुनाई गई थी। हालांकि पीठ ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषी को ताउम्र जेल में रखने और सरकार को उसके मानसिक स्वास्थ्य की उचित देखभाल का आदेश दिया है।

– ईएमएस