हमारे जवानों की नहीं होगी मौत, अंतरिक्ष से लैंडमाइंस भी खोज निकालेगा हाईसिस


इसरो ने पीएसएलवी सी-43 द्वारा भारत का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटलाइट लांच किया। अधिक ऊंचाई से लैंडमाइंस मैपिंग करने में सक्षम होगा।
Photo/twitter.com
अमेरिका और चीन की कतार में शामिल हुआ भारत

नई दिल्ली। कुछ महीने पहले ओडिशा में स्निफर डॉग्स और मेटल डिटेक्टर्स ने मॉर्निंग ड्रिल पर निकले सीआरपीएफ जवानों के एक ग्रुप को शक्तिशाली लैंडमाइंस से बचा लिया। शोध के मुताबिक पिछले 17 सालों में मिलिटरी जवानों सहित 3700 से अधिक लोग लैंडमाइंस के ऊपर आने की वजह से मारे जा चुके हैं लेकिन अब ऐसा नहीं होगा हमारे जवान नहीं मरने वाले है। इसरो ने शुक्रवार को पोलर सैटलाइट लांच वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 द्वारा 31 सैटलाइट को सफलतापूर्वक लांच किया है। इसमें भारत का हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटलाइट भी शामिल है। यह अंतरिक्ष में 600 किमी से भी अधिक ऊंचाई से लैंडमाइंस मैपिंग करने में सक्षम होगा।

Photo/Twitter

बताया जा रहा हैं कि इसका कैमरा इतना शक्तिशाली है कि यह कीचड़ या बर्फ पर टायरों के निशान, स्वस्थ व खराब फसलों में फर्क और जमीन में छिपे खनिजों को भी खोज सकता है। अब तक अमेरिका और चीन जैसे कुछ देशों ने ही हाईसिस जैसी तकनीक को अपने सैटलाइट में शामिल किया है। आईआईटी मद्रास के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के प्रोफेसर उदय के खानखोजे ने बताया कि नियर इन्फ्रारेड औ शॉर्टवेब इन्फ्रारेड क्षमता वाले हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरे मिट्टी में 5 सेमी अंदर तक देख सकते हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि यह रॉडर जितने उपयोगी नहीं हैं जो वेब एनर्जी भेज ज्यादा गहराई तक पता लगा सकता है। हाईसिस कैमरा विजिबल और नीयर इन्फ्रारेड पर काम करेगा जिसकी वेबलेंग्थ 400 और 1400 नैनोमीटर के बीच होगी। इसकी शॉर्टवेब-इन्फ्रारेड वेबलेंग्थ 1400 और 3000 नैनोमीटर के बीच होगी। हाईसिस जमीन का अध्ययन करने वाले अभी मौजूद सभी सैटलाइट से बेहतर है और यह ज्यादा स्पष्ट तस्वीर देता है। सैटलाइट एक्सपर्ट और इसरो के पूर्व चेयरमैन एएस किरण कुमार ने बताया कि मनुष्य की आंख लाल, हरे और नीले रंग का कॉन्बिनेश ही देख सकती है। हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजर्स इलेक्ट्रोमैगनेटिक स्पेक्ट्रम में किसी भी दो रंग के बीच में मौजूद रंगों की पहचान कर सकता है, उनकी तस्वीर ले सकता है।

जानकारों ने बताया कि हाईसिस का कैमरा धरती पर 55 अलग-अलग रंगों की पहचान कर सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि यह मिट्टी, इसके नीचे दबी चीजें, यहां तक कि जमीन के नीचे मेटल और मिनरल्स की भी पहचान कर सकता है। खानखोजे के मुताबिक यह जीवित और मृत पौधों में फर्क भी कर सकता है। हालांकि दूसरी तरफ यह सिंथेटिक अपर्चर वाले सैटलाइट की तरह अंधेरे में नहीं देख सकेगा। सूरज की रोशनी में इसकी देखने की क्षमता हमारे एक मीटर तक की दूरी तक की चीजों को देखने की क्षमता के बराबर होगी। इस लिहाज से यह सर्विलांस के अलावा खेती, फॉरेस्ट्री, कोस्टल जोन की निगरानी, धरती के नीचे पानी, मिट्टी और दूसरे जियोलॉजिकल इन्वायरनमेंट्स के लिहाज से भी मददगार होगा। इस सैटलाइट में डिटेक्टर आरे चिप अहमदाबाद के स्पेस ऐप्लिकेशन सेंटर ने डिजाइन की है। इसे चंडीगढ़ की सेमी कंडक्टर लैबरेटरी ने बनाया है। यह चिप 1000*66 पिक्सल्स को रीड कर कती है। अमेरिका और चीन जैसे कुछ ही देश हैं जिन्होंने इस टेक्नॉलोजी को अपने सैटलाइट में इस्तेमाल किया है।

– ईएमएस