ससी/एसटी पदोन्नति के लिए आंकड़े जुटाने की जरूरत नहीं : सर्वोच्च न्यायालय


नई दिल्ली| सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि राज्य को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) वाले लोगों को पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए उनके पिछड़ेपन पर आंकड़े इकठ्ठा करने की जरूरत नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने केंद्र द्वारा अदालत के वर्ष 2006 में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए दाखिल याचिका पर यह बात कही। अदालत ने अपने पिछले फैसले में एससी/एसटी को पदोन्नति में आरक्षण देने पर विचार करने के लिए मात्रात्मक आंकड़े जुटाने की व्यवस्था जोड़ी थी।

शीर्ष अदालत ने अपने 2006 के फैसले में कहा था, “राज्य को पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान करने से पहले प्रत्येक मामले में अनिवार्य कारणों यानी पिछड़ापन, प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता और समग्र प्रशासनिक दक्षता की स्थिति को दिखाना होगा।”

इस फैसले को नागराज मामले के नाम से जाना जाता है।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ, न्यायमूर्ति रोहिंटन फली नरीमन, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा की पीठ ने पहले यह स्पष्ट किया था कि एससी/एसटी के भीतर क्रीमी लेयर की अवधारणा का कोई मुद्दा नहीं है। पीठ ने कहा था, “हो सकता है जो कुछ लोग (एससी/एसटी के भीतर मौजूद) इस कलंक से उबर चुके हों, लेकिन यह समुदाय लगातार इस कलंक का सामना कर रहा है।”

पीठ ने 30 अगस्त को इस मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

केंद्र सरकार जल्द लागू करे प्रमोशन में रिजर्वेशन : मायावती

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने प्रोन्नति में आरक्षण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार को प्रमोशन में आरक्षण जल्द लागू करना चाहिए। मायावती ने बुधवार को एक बयान जारी कर यह बातें कही। उन्होंने कहा है कि उच्चतम न्यायालय ने इस संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, इसका हम स्वागत करते हैं। अब ये केंद्र और राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि वह प्रमोशन में आरक्षण देती है कि नहीं। इसके बाद मायावती ने केंद्र सरकार से प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था जल्द लागू करने की मांग की।

गौरतलब है कि पदोन्नति में आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय ने 12 साल पहले दिए फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने कहा कि इस पर फिर से विचार करने की जरूरत और आंकड़े जुटाने की आवश्यकता नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 2006 में नागराज मामले में दिए गए उस फैसले को सात सदस्यों की पीठ के पास भेजने की जरूरत नहीं है, जिसमें अनुसूचित जातियों (एससी) एवं अनुसूचित जनजातियों (एसटी) को नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए शर्ते तय की गई थीं।

–आईएएनएस