रेरा से भरोसा बढ़ा, अब भी अटके पर पुराने प्रोजेक्ट


बिल्डर की मनमानी पर अंकुश लगाने और खरीदारों की शिकायतों के निपटारे के लिए बने कानून रेरा के एक मई से दो साल पूरे हो चुके हैं।

नई दिल्ली । बिल्डर की मनमानी पर अंकुश लगाने और खरीदारों की शिकायतों के निपटारे के लिए बने कानून रेरा के एक मई से दो साल पूरे हो चुके हैं। इससे ग्राहकों का भरोसा तो लौटा है, लेकिन हजारों अटके प्रोजेक्ट से खरीदार परेशान हैं। रेरा को २०१७ में लाया गया था और नोटबंदी व जीएसटी के साथ इस कानून ने इस सेक्टर में काले धन और डेवलपरों की मनमानी पर शिकंजा कसा है। इसके तहत हर राज्य में एक नियामक बनाया गया है, जो खरीदारों की शिकायत सुनता है। रेरा में अब तक ३९,८५५ प्रोजेक्ट और ३०,८२४ एजेंट पंजीकृत हो चुके हैं। एनारॉक की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली समेत सात बड़े शहरों में ५.६ लाख मकान देरी से अटके हैं, जिनमें ४.५ लाख करोड़ फंसे हैं। इनमें से ज्यादा परियोजनाएं रेरा के पहले लॉन्च हुई थीं।

रीयल इस्टेट संगठन क्रेडाई के यूपी वेस्ट के प्रमुख अमित मोदी ने कहा कि रेरा से घरों की बिक्री ने फिर रफ्तार पकड़ी है। लेकिन रेरा में सिर्फ मौजूदा प्रोजेक्ट ही शामिल हैं और पुराने प्रोजेक्ट का हल निकालना जरूरी है। डेवलपर्स सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम चाहते हैं और कोर्ट या उपभोक्ता फोरम की जगह रेरा में ही सारे मामले सुने जाएं। नेशनल काउंसिल ऑन अफोर्डेबल हाउसिंग (एसोचैम) के चेयरमैन प्रदीप अग्रवाल ने कहा कि खरीदार भी जानते हैं कि उनके पास शिकायत करने के लिए एक मंच है और इसलिए वे निवेश के लिए ज्यादा चिंतित नहीं हैं।

– ईएमएस