रक्षा क्षेत्र में जबलपुर का है अहम रोल


भारतीय सेना को बल प्रदान करने में जबलपुर का महत्वपूर्ण योगदान है। यहां बम, बारूद से लेकर तोप का निर्माण किया जाता है।
Photo/Twitter
बम और तोप बनाने से लेकर यहां तैयार होते हैं सैनिक

जबलपुर। भारतीय सेना को बल प्रदान करने में जबलपुर का महत्वपूर्ण योगदान है। यहां बम, बारूद से लेकर तोप का निर्माण किया जाता है। सेना के लिए वाहन बनाए जाते हैं। इसके साथ ही जबलपुर में महत्वपूर्ण आयुध निर्माणियां होने के साथ ही यहां सेना भर्ती कार्यालय भी है। जिसके माध्यम से करीब १५ जिलों के युवाओं को आम युवक से सैनिक बनाने के लिए भर्ती किया जाता है। हर साल करीब ३३ हजार से अधिक युवा सेना में भर्ती होने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराते हैं। अकेले जबलपुर से करीब ४ हजार युवा सेना में जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराते हैं।

१४ फरवरी को पुलवामा हमले में शहीद हुए अश्वनी काछी जबलपुर के खुड़ावल गांव के हैं। मिराज विमान से पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हुई कार्रवाई के बाद जिले में खुशी का माहौल है। शहीद अश्वनी के पिता सुकरू काछी का कहना है कि भारतीय सेना की यह कार्रवाई पुलवामा में शहीद हुए जवानों के लिए सच्ची श्रद्धांजलि है। आसमान में उनका बेटा भी इस कार्रवाई से खुश होगा।

ये है जबलपुर की शान
  • आयुध निर्माणी खमरिया- आयुध निर्माणी खमरिया देश की प्रमुख आयुध निर्माणियों में शुमार है। इसकी स्थापना आजादी से पहले १९४२ में की गई थी। इसमें ५,६०० कर्मचारी हैं। यहां सेना के लिए बम बनाए जाते हैं। मिराज विमान से गिरया गया बम यहीं बनाया गया है। सेना के लिए धनुष तोप भी यहीं बनाई गई है।
  • वीकल फैक्ट्री- सेना को रसद पहुंचाने के साथ सैनिकों को यहां से वहां ले जाने में वीकल फैक्ट्री में बने ट्रकों का प्रयोग होता है। फैक्ट्री की स्थापना १९६९ में हुई थी। इसमें ३,००० कर्मचारी हैं।
  • गन कैरिज फैक्ट्री- देश की सबसे पुरानी आयुध निर्माणियों में गन कैरिज फैक्ट्री भी शामिल है। इसकी स्थापना १९०४ में की गई थी। इसमें ३५०० कर्मचारी हैं। इस फैक्ट्री में सेना के लिए आयुध तैयार किए जाते हैं।
  • ग्रे आयरन फाउंड्री – १९७२ में ग्रे आयरन फाउंड्री की स्थापना वीकल फैक्ट्री की सहायक निर्माणी के रूप में हुई। इसमें वर्तमान में ७,०० कर्मचारी काम करते हैं। यहां एरियल बम और हैंड ग्रेनेड की बॉडी व एमुनेशन बॉक्स के अलावा दूसरे कलपुर्जे ढाले जाते हैं।
  • ५०६ आर्मी बेस वर्कशॉप
    देश के अंदर बोफोर्स तोप की मरम्मत के लिए यही एकमात्र जगह है। विशेषज्ञ कर्मचारियों द्वारा इसका रखरखाव किया जाता है। इसी तरह एके-४७ गन की रिपेयरिंग भी यहीं होती है।
यहां बनते हैं धनुष तोप से लेकर टारपीडो

धनुष तोप और टारपीडो का आपात स्थिति में उत्पादन तेज कर दिया जाता है। देश की ४१ आयुध निर्माणियों में से चार शहर में हैं। इनमें २०० से अधिक तरह के सैन्य साजो-सामान का उत्पादन किया जाता है। १९६५, १९७१ और १९९९ की लड़ाई में इनकी जबर्दस्त भूमिका रही। कुछ प्रमुख उत्पादों की बड़ी विशेषता है।

भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शुमार हो गया है, जिसके पास स्वयं का गनर सिस्टम है। इतना ही नहीं ३८ किलोमीटर तक मारक क्षमता वाली धनुष तोप इलेक्ट्रिक सिस्टम से लैस है। ज्गन को विकसित करने में १५ से २० साल का समय लगता है, लेकिन जीसीएफ ने महज ७ साल में गन को तैयार कर लिया है। अब तक १२ धनुष तोप बनकर तैयार हैं।
पोखरण में यूजर ट्रायल के दौरान ६ धनुष तोपों से ७ जून को १०० राउंड से ज्यादा फायर किए गए। दक्षिण आप्रिâका से आयातित बीएमसी को भी धनुष तोप से फायर किया गया। धनुष तोप की सफलता के बाद देश के रक्षा विभाग व डीआरडीओ १५५ एमएम गन सिस्टम के विकास व उत्पादन को लेकर उत्साहित है। अब देश की कई और कंपनी १५५ एमएम गन सिस्टम को उत्पादित करने पर विचार कर रही हैं। उन्होंने कहा धनुष तोप देश की विदेशी तोपों के आयात पर निर्भरता समाप्त कर देगी।

३६० डिग्री एंगल में धूम जाता है ‘धनुष’
‘धनुष’ की कार्यप्रणाली के दौरान देखा गया कि ये ३६० डिग्री एंगल में काफी तेजी से लगातार घूम सकता है। इसके पिछले हिस्से में एक से डेढ़ फीट का उठाव होता है जो लगातार इसके घूमने में मदद करता है। इतना ही नहीं इसकी ऑटो बारूद लोडिंग टेक्नोलॉजी इसे बोफोर्स जैसी तोप से भी अलग बताती है। धनुष्य सी टेक्नोलॉजी वर्तमान में स्वीडन जैसे देशों के पास भी नहीं है।

– ईएमएस