आज़ादी हमारे पूर्वजों और स्वाधीनता सेनानियों के वर्षों के त्याग और वीरता का परिणाम : राष्ट्रपति


स्वतंत्रा दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम सम्बोधन की खास बातें
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (फोटो साभार : हिंदुस्तान टाईम्स)

नई दिल्ली (ईएमएस)। स्वतंत्रा दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम सम्बोधन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि आज़ादी हमारे पूर्वजों और स्वाधीनता सेनानियों के वर्षों के त्याग और वीरता का परिणाम थी। उन्होंने देशवासियों को स्वतन्त्रता दिवस की बधाईयां देते हुए कहा कि 15 अगस्त का दिन प्रत्येक भारतीय के लिए पवित्र होता है। हमारा ‘तिरंगा’ हमारे देश की अस्मिता का प्रतीक है। इस दिन हम देश की संप्रभुता का उत्सव मनाते हैं और अपने उन पूर्वजों के योगदान को कृतज्ञता से याद करते हैं, जिनके प्रयासों से हमने बहुत कुछ हासिल किया है।

राष्ट्रपति ने कहा स्वाधीनता संग्राम में संघर्ष करने वाले सभी वीर और वीरांगनाएं, असाधारण रूप से साहसी और दूर-द्रष्टा थे। इस संग्राम में देश के सभी क्षेत्रों, वर्गों और समुदायों के लोग शामिल थे। वे चाहते तो सुविधापूर्ण जीवन जी सकते थे, लेकिन देश के प्रति अपनी अटूट निष्ठा के कारण उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे एक ऐसा स्वाधीन और प्रभुता-सम्पन्न भारत बनाना चाहते थे, जहां समाज में बराबरी और भाई-चारा हो। हम उनके योगदान को हमेशा याद करते हैं।

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राष्ट्रपति ने कहा कि हम भाग्यशाली हैं कि हमें महान देशभक्तों की विरासत मिली है। उन्होंने हमें एक आज़ाद भारत सौंपा है। साथ ही उन्होंने कुछ ऐसे काम भी सौंपे हैं, जिन्हें हम सब मिलकर पूरा करेंगे। देश का विकास करने, तथा ग़रीबी और असमानता से मुक्ति प्राप्त करने के काम हम सबको करने हैं। हमारे किसान उन करोड़ों देशवासियों के लिए अन्‍न पैदा करते हैं, जिनसे वे कभी आमने-सामने मिले भी नहीं होते। वे देश के लिए खाद्य सुरक्षा और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराके हमारी आज़ादी को शक्ति प्रदान करते हैं। जब हम उनके खेतों की पैदावार और उनकी आमदनी बढ़ाने के लिए आधुनिक टेक्नॉलॉजी और अन्य सुविधाएं उपलब्‍ध कराते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे सैनिक, सरहदों पर, बर्फीले पहाड़ों पर, चिलचिलाती धूप में, सागर और आसमान में, पूरी बहादुरी और चौकसी के साथ, देश की सुरक्षा में समर्पित रहते हैं। वे बाहरी खतरों से सुरक्षा करके हमारी स्वाधीनता सुनिश्‍चित करते हैं। जब हम सैनिकों के लिए बेहतर हथियार उपलब्ध कराते हैं, स्वदेश में ही रक्षा उपकरणों के लिए सप्लाई-चेन विकसित करते हैं, और सैनिकों को कल्याणकारी सुविधाएं प्रदान करते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं।

हमारी पुलिस और अर्धसैनिक बल अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हैं। वे आतंकवाद का मुक़ाबला करते हैं तथा अपराधों की रोकथाम और कानून-व्यवस्था की रक्षा करते हैं। साथ ही साथ प्राकृतिक आपदाओं के समय वे हम सबको सहारा देते हैं। जब हम उनके काम-काज और व्यआक्तिमगत जीवन में सुधार लाते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं।

राष्ट्रपति ने अपने संबोधन के दौरान महिलाओं की बात भी की। उन्होंने कहा कि महिलाओं की हमारे समाज में एक विशेष भूमिका है। कई मायनों में महिलाओं की आज़ादी को व्यापक बनाने में ही देश की आज़ादी की सार्थकता है। यह सार्थकता, घरों में माताओं, बहनों और बेटियों के रूप में, तथा घर से बाहर अपने निर्णयों के अनुसार जीवन जीने की उनकी स्वतंत्रता में देखी जा सकती है। उन्हें अपने ढंग से जीने का, तथा अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग करने का सुरक्षित वातावरण तथा अवसर मिलना ही चाहिए। साथ ही साथ प्राकृतिक आपदाओं के समय वे हम सबको सहारा देते हैं। जब हम उनके काम-काज और व्यक्तिगत जीवन में सुधार लाते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा ‘महिलाएं अपनी क्षमता का उपयोग चाहे घर की प्रगति में करें, या फिर हमारे work force या उच्च शिक्षा-संस्थानों में महत्वपूर्ण योगदान देकर करें, उन्हें अपने विकल्प चुनने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए। एक राष्ट्र और समाज के रूप में हमें यह सुनिश्‍चित करना है कि महिलाओं को जीवन में आगे बढ़ने के सभी अधिकार और क्षमताएं सुलभ हों। जब हम महिलाओं द्वारा चलाए जा रहे उद्यमों या स्टार्ट-अप के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराते हैं, करोड़ों घरों में एलपीजी कनेक्शन पहुंचाते हैं, और इस प्रकार महिलाओं का सशक्तीकरण करते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं। हमारे नौजवान भारत की आशाओं और आकांक्षाओं की बुनियाद हैं। हमारे स्वाधीनता संग्राम में युवाओं और वरिष्ठ-जनों सभी की सक्रिय भागीदारी थी, लेकिन उस संग्राम में जोश भरने का काम विशेष रूप से युवा वर्ग ने किया था’।

राष्ट्रपति ने कहा, हम अपने युवाओं का कौशल-विकास करते हैं, उन्हें टेक्नॉलॉजी, इंजीनियरिंग और उद्यमिता के लिए, तथा कला और शिल्प के लिए प्रेरित करते हैं। जब हम अपने युवाओं की असीम प्रतिभा को उभरने का अवसर प्रदान करते हैं, तब हम अपने स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं।वह प्रत्येक भारतीय जो अपना काम निष्ठा व लगन से करता है – चाहे वह डॉक्टर हो, नर्स हो, शिक्षक हो, लोक सेवक हो, फैक्ट्री वर्कर हो, व्यापारी हो, बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाली संतान हो ये सभी स्वाधीनता के आदर्शों का पालन करते हैं। हमारे जो देशवासी क़तार में खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं, और अपने से आगे खड़े लोगों के अधिकारों का सम्मान करते हैं, वे भी हमारे स्वाधीनता सेनानियों के सपनों का भारत बनाते हैं। यह एक बहुत छोटा सा प्रयास है। आइए, इसे हम सब अपने जीवन का हिस्सा बनाएं।
राष्ट्रपति ने कहा ‘हमें गांधीजी के विचारों की गहराई को समझने का प्रयास करना होगा। उन्हें राजनीति और स्वाधीनता की सीमित परिभाषाएं, मंजूर नहीं थीं। जब गांधीजी और उनकी पत्नी कस्तूरबा, चंपारन में नील की खेती करने वाले किसानों के आंदोलन के सिलसिले में बिहार गए तो वहाँ उन्होंने काफी समय, वहाँ के लोगों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों को, स्वच्छता और स्वास्थ्य की शिक्षा देने में लगाया। चंपारन में, और अन्य बहुत से स्‍थानों पर, गांधी जी ने स्वयं, स्वच्छता अभियान का नेतृत्व किया। उन्होंने साफ-सफाई को, आत्म-अनुशासन और शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक माना।

उस समय, बहुत से लोगों ने यह सवाल उठाया था कि इन सब बातों का भला स्वाधीनता संग्राम के साथ क्या लेना-देना है? महात्मा गांधी के लिए, स्वाधीनता के अभियान में, उन बातों का बहुत महत्व था। उनके लिए वह केवल राजनैतिक सत्ता प्राप्त करने का संग्राम नहीं था, बल्कि ग़रीब से ग़रीब लोगों को सशक्त बनाने, अनपढ़ लोगों को शिक्षित करने, तथा हर व्यक्ति, परिवार, समूह और गांव के लिए सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार का संघर्ष था।

गांधी जी ‘स्वदेशी’ पर बहुत ज़ोर दिया करते थे। उनके लिए यह भारतीय प्रतिभा और संवेदनशीलता को बढ़ावा देने का प्रभावी माध्यम था। वे दुनिया के अन्य हिस्सों में प्रचलित चिंतन-धाराओं के बारे में सजग थे। वे यह मानते थे कि, भारतीय सभ्यता के अनुसार, हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, नए-नए विचारों के लिए, अपने मस्तिष्क की खिड़कियां खुली रखनी चाहिए। यह स्वदेशी की उनकी अपनी सोच थी। दुनिया के साथ हमारे सम्बन्धों को परिभाषित करने में – हमारी अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक आकांक्षाओं और नीतिगत विकल्पों के चयन में – स्वदेशी की यह सोच आज भी प्रासंगिक है।

गांधीजी का महानतम संदेश यही था कि हिंसा की अपेक्षा, अहिंसा की शक्ति कहीं अधिक है। प्रहार करने की अपेक्षा, संयम बरतना, कहीं अधिक सराहनीय है तथा हमारे समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। गांधीजी ने अहिंसा का यह अमोघ अस्त्र हमें प्रदान किया है। उनकी अन्य शिक्षाओं की तरह, अहिंसा का यह मंत्र भी, भारत की प्राचीन परम्‍परा में मौजूद था, और आज 21वीं सदी में भी, हमारे जीवन में यह उतना ही उपयोगी और प्रासंगिक है।

इस स्वाधीनता दिवस के अवसर पर, जो गांधीजी की 150वीं जयंती समारोहों के, इतना करीब है, हम सब भारतवासी अपने दिन-प्रतिदिन के आचरण में, उनके द्वारा सुझाए गए रास्तों पर चलने का संकल्प लें। हमारी स्वाधीनता का उत्सव मनाने, तथा भारतीयता के गौरव को महसूस करने का, इससे बेहतर कोई और तरीका नहीं हो सकता।

यह भारतीयता केवल हमारे लिए नहीं है। यह पूरे विश्व को भारतीय सभ्‍यता की देन है। गांधीजी और भारत की सोच ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की रही है, हम पूरी दुनिया को एक ही परिवार मानते हैं। इसीलिए हमारा ध्यान सदैव विश्व-कल्याण पर होता है, चाहे वह अफ्रीकी देशों की सहायता करना हो, जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर पहल करनी हो, संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के लिए दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में सेना भेजनी हो, पड़ोसी देशों में प्राकृतिक आपदा के समय मदद पहुंचानी हो, या फिर विश्व में कहीं भी, विषम परिस्थितियों में फंसे भारतवासियों को वहाँ से सुरक्षित निकालने के साथ-साथ, दूसरे देशों के नागरिकों को भी वहाँ से बाहर निकालना हो। गांधीजी और भारत की इसी सोच के अनुसार, हम स्वास्थ्य एवं मानव-कल्याण के लिए योगाभ्यास को, तथा विकास के लिए आधुनिक टेक्नॉलॉजी को, पूरी दुनिया के साथ साझा करते हैं। हम सब गांधीजी की संतान हैं। जब हम एकाकी पथ पर चलते हैं, तब भी हमारी आँखों में पूरी मानवता के कल्याण के सपने होते हैं।’