भागवत ने की राम मंदिर निर्माण के लिए कानून की वकालत और सबरीमाला पर अदालती फैसले की आलोचना


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नागपुर| अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को राष्ट्रीय हित का मुद्दा बताते हुए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने गुरुवार को जल्द से जल्द उचित कानून लाकर मंदिर बनाने की वकालत की और इस प्रक्रिया में बाधा डालने को लेकर कुछ रुढ़िवादी तत्वों की निंदा की। साथ ही साथ उन्होंने सबरीमाला मंदिर में सभी आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की आलोचना भी की। भागवत ने कहा कि फैसला दोषपूर्ण है क्योंकि इसमें सभी पहलुओं पर विचार नहीं किया गया और इसलिए इसे सहजता से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को यहां वार्षिक विजयादशमी उत्सव के दौरान अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि रूढ़िवादी तत्व व ताकतें अपने खुद के लाभ की वजह से सांप्रदायिक राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के छल के बावजूद भी जमीन के स्वामित्व के संदर्भ में फैसला जल्द से जल्द होना चाहिए और सरकार को ‘भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए रास्ता बनाना चाहिए।’

उन्होंने कहा कि आरएसएस भगवान राम के जन्मस्थान पर मंदिर निर्माण के प्रयास में देश के करोड़ों लोगों के भावनाओं के साथ हमेशा जुड़ी रही है। उन्होंने कहा, “भगवान राम राष्ट्र के जीवन ऊर्जा का आदर्श व धर्म को कायम रखने के प्रतीक हैं।”

१८ अक्टूबर, २०१८ को नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय पर विजयादशमी के कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत और मुख्य अतिथि कैलाश सत्यार्थी। (Photo: IANS)

सबरीमाला मामले पर भागवत ने स्वंयसेवकों से कहा, “यह फैसला सभी पहलुओं पर बिना विचार किए लिया गया, इसे न तो वास्तविक व्यवहार में अपनाया जा सकता है और न ही यह बदलते समय व स्थिति में नया सामाजिक क्रम बनाने में मदद करेगा।”

भागवत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के 28 सितंबर के फैसले की वजह से सबरीमाला में बुधवार को जो स्थिति दिखाई दी, उसका कारण सिर्फ यह है कि समाज ने उस परंपरा को स्वीकार किया था और लगातार कई सालों से पालन होती आ रही परंपरा पर विचार नहीं किया गया।

उन्होंने कहा, “लैंगिक समानता का विचार अच्छा है। हालांकि, इस परंपरा का पालन कर रहे अनुयायियों से चर्चा की जानी चाहिए थी। करोड़ों भक्तों के विश्वास पर विचार नहीं किया गया।”

–आईएएनएस