अयोध्या पर 25 साल पहले कांग्रेस के अध्यादेश का भाजपा ने किया था विरोध


कांग्रेस सरकार अयोध्या मसले पर अध्यादेश लाई थी। आज अध्यादेश की मांग करने वाली भाजपा ने तब इसका विरोध किया था।

– आज फिर उठ रही अध्यादेश लाने की मांग

– कांग्रेस ने कहा सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करे सरकार

नई दिल्ली। अयोध्या में जमीन विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा सुनवाई को जनवरी तक टल देने के बाद अब कानून बनाकर राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की मांग जोर पकड़ रही है। अभी केन्द्र की मोदी सरकार ने इस पर कोई फैसला नहीं लिया है। लेकिन कांग्रेस कह रही है कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए।

हालांकि आज से ठीक 25 साल पहले कांग्रेस सरकार अयोध्या मसले पर अध्यादेश लाई थी जिस अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया। आज अध्यादेश की मांग करने वाली भाजपा ने तब इसका विरोध किया था। विश्व हिंदू परिषद की अगुवाई में बीजेपी के समर्थन से चल रहे राम मंदिर आंदोलन के परिणाम स्वरूप 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। इसके एक साल बाद जनवरी 1993 में यह अध्यादेश लाया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने 7 जनवरी 1993 को इस मंजूरी दी थी। इसके तहत विवादित परिसर की कुछ जमीन का सरकार की तरफ से अधिग्रहण किया जाना था। राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद तत्कालीन गृहमंत्री एसबी चव्हाण ने इस बिल को मंजूरी के लिए लोकसभा में रखा गया था। पास होने के बाद इस अयोध्या अधिनियम के नाम से जाना गया है।

उस समय बिल पेश करते समय तत्कालीन गृहमंत्री चव्हाण ने कहा था, देश के लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की भावना को बनाए रखना जरूरी है। ठीक यहीं तर्क बीजेपी और आरएसएस के नेता भी दे रहे हैं। अयोध्या अधिनियम विवादित ढांचे और इसके पास की जमीन को अधिग्रहित करने के लिए लाया गया था। नरसिम्हा राव सरकार ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि के साथ इसके चारों तरफ 60.70 एकड़ भूमि अधिग्रहित की थी। इस लेकर कांग्रेस सरकार की योजना अयोध्या में एक राम मंदिर, एक मस्जिद, लाइब्रेरी, म्यूजियम और अन्य सुविधाओं के निर्माण की थी।

हालांकि अयोध्या अधिनियम से राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ नहीं हो पाया। बीजेपी ने नरसिम्हा राव सरकार के इस कदम का पुरजोर विरोध किया था। बीजेपी के तत्कालीन उपाध्यक्ष एसएस भंडारी ने इस कानून को पक्षपातपूर्ण, तुच्छ और प्रतिकूल बताते हुए खारिज कर दिया था। बीजेपी के साथ मुस्लिम संगठनों ने भी इस कानून का विरोध किया था। इसके बाद नरसिम्हा राव सरकार ने अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से भी इस मसले पर सलाह मांगी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राय देने से मना कर दिया था। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या राम जन्भूमि बाबरी मस्जिद के विवादित जगह पर कोई हिंदू मंदिर या कोई हिंदू ढांचा था। तब 5 जजों (जस्टिस एमएन वेंकटचलैया, जेएस वर्मा, जीएन रे, एएम अहमदी और एसपी भरूचा) की खंडपीठ ने इन सवालों पर विचार किया था लेकिन कोई जवाब नहीं दिया था।

– ईएमएस