ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ के नियमों की ढाई दशक बाद विशेषज्ञों करेंगे समीक्षा


देश में अतिरिक्त पिछड़ी जातियों में 'क्रीमी लेयर' से जुड़े नियमों को बने करीब ढ़ाई दशक बीत गए है। अब इन नियमों की समीक्षा आवश्यक हो गई है।
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नई दिल्ली। देश में अतिरिक्त पिछड़ी जातियों (ओबीसी) में ‘क्रीमी लेयर’ से जुड़े नियमों को बने करीब ढ़ाई दशक बीत गए है। अब इन नियमों की समीक्षा आवश्यक हो गई है। लिहाजा, 26 सालों बाद ओबीसी ‘क्रीमी लेयर’ से संबंधित नियमों की समीक्षा होगी। 1993 में इसके लिए जो नियम तय किए गए थे, अब तक उसकी समीक्षा नहीं हुई थी। सरकार ने विशेषज्ञों की एक कमेटी का गठन किया है जो उन नियमों पर गौर करेगी जिसके आधार पर ‘क्रीमी लेयर’ तय की जाती है। सामाजिक न्याय मंत्रालय ने 8 मार्च को एक कमेटी का गठन किया है जिसका नेतृत्व भारत सरकार के पूर्व सचिव बीपी शर्मा करेंगे। कमेटी को 15 दिनों में अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है। यह कमिटी प्रसाद कमेटी द्वारा तय नियमों की समीक्षा करेगी। इसके बाद कमिटी क्रीमी लेयर के कॉन्सेप्ट को फिर से परिभाषित करने, सरल बनाने और उसमें सुधार के लिए अपना सुझाव देगी। कमेटी इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई व्यवस्थाओं को ध्यान में रखते हुए नियमों की समीक्षा करेगी। क्रीमी लेयर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का आर्थिक रूप से विकसित वर्ग है। उनको मंडल आयोग में किए गए आरक्षणों के प्रावधान का पात्र नहीं माना जाता है। मंडल आयोग पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद क्रीमी लेयर को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने के लिए नियम तय किए गए थे। ये नियम प्रसाद कमेटी की रिपोर्ट पर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के 1993 के मेमोरंडम द्वारा निर्धारित किए गए थे।

कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग संपन्नता के अलग-अलग पैमानों का इस्तेमाल करता है जिसने विवाद को जन्म दिया। इसकी वजह से ही नियमों की समीक्षा की जरूरत पड़ी। क्रीमी लेयर निर्धारित करने के लिए विभाग उन लोगों के लिए पारिवारिक आय के अलग पैमाने का इस्तेमाल करता है जिनके माता या पिता को केंद्र और राज्य सरकारों में सेवारत हैं। वहीं पीएसयू में कार्यरत लोगों के लिए अलग पैमाना है। समस्या की असल जड़ यह है कि पीएसयू में पदों को ग्रुप ए, बी, सी और डी में बांटा नहीं गया है जबकि सरकारी नौकरियों में अलग-अलग ग्रुपों का प्रावधान है। इससे कंफ्यूजन पैदा होती है। सरकार के इस कदम का एक वर्ग द्वारा विरोध भी किया जा रहा है। पिछड़ा वर्ग अधिकार के लिए काम करने वाले कार्यकर्ता इसके खिलाफ हैं। सवाल यह किया जा रहा है कि पहले से संवैधानिक दर्जा प्राप्त एक राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) है जिसके पास कई तरह की शक्तियां हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने ‘क्रीमी लेयर’ मामले पर एक्सपर्ट की एक कमेटी का गठन क्यों किया? भाजपा सदस्यों पर आधारित एनसीबीसी के पास ओबीसी से जुड़े प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उपाय सुझाने की शक्ति मौजूद है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे में एक अलग कमेटी के गठन का कोई औचित्य नहीं है।

– ईएमएस