हर सात में से एक भारतीय पर मलेरिया का खतरा


चेन्नई। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर सात भारतीय में से एक भारतीय के मलेरिया से ग्रसित होने का खतरा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत, पाकिस्तान और इथियोपिया में पूरे विश्व की जनसंख्या के ८० फीसद लोग मलेरिया के शिकार हैं। मगर, इन देशों में सरकारें मलेरिया पर रोकथाम के लिए कम खर्च करती हैं। नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज वंâट्रोल प्रोग्राम के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब १३ करोड़ लोगों में मलेरिया के लक्षण देखे गए थे। इसमें करीब १ करोड़ लोगों में मलेरिया की पुाqष्ट हुई थी। २०११ में एक करोड़ ३१ लाख लोग मलेरिया से प्रभावित। २०१२ में एक करोड़ १६ लाख लोग प्रभावित। २०१३ में ८८ लाख लोग प्रभावित। मलेरिया से मरने वालों की संख्या २०१२ में जहां ५१९ थी, वहीं २०१४ में ये आंकड़ा ५६२ पर पहुंच गया। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक आंकडे में ये इजाफा ओडिशा और त्रिपुरा में मलेरिया के पैâलने की वजह से हो सकता है। ओडिशा में तीन लाख ९५ हजार लोगों में मलेरिया के लक्षण देखे गए, जबकि छत्तीसगढ़ और झारखंड दूसरे और तीसरे स्थान पर थे।
भारत में मलेरिया के बढ़ रहे खतरे की वजह प्रतिबंधित दवाओं के इस्तेमाल को बताया जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक मच्छरों की प्रतिरोधक क्षमता में इजाफा हुआ है जिसकी वजह से मलेरिया पर प्रभावी नियंत्रण लगा पाना एक बड़ी चुनौती बन गई है। एनवीबीडीसीपी के मुताबिक भारत मे तीन साल पहले िंसगल ड्रग के इस्तेमाल से मच्छरों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गयी थी, लेकिन अब मल्टी ड्रग थिरेपी के इस्तेमाल के बाद प्रतिरोधक क्षमता को घटाने में कामयाबी मिली है। हालांकि, दवाओं के असर को जानने के लिए हर साल १५ मरीजों का अध्ययन किया जाता है। मलेरिया जटिल संक्रमण है जो जलवायु परिवर्तन, लोगों के रहन सहन पर निर्भर करता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इन खतरों के बावजूद भारत में मलेरिया के पैâलाव पर २०१६ के अंत तक पचास फीसद तक की कमी हो सकती है, लेकिन ये सब सरकार के प्रयासों पर निर्भर करेगा।