स्माल एवं मध्यम समाचार पत्रों को खत्म करने की साजिश


नई दिल्ली । सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने नई विज्ञापन नीति जारी की है। इस विज्ञापन नीति के लागू हो जाने के बाद देश के ८० से ९० ़फीसदी लघु एवं मध्यम श्रेणी के भाषाई समाचार पत्र विज्ञापन के अभाव में बंद हो जाएंगे। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जो नई अंकीय व्यवस्था लागू की है। उसके बाद लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों को वेंâद्र एवं राज्य सरकारों के विज्ञापन मिलना संभव ही नहीं होगा। डीएवीपी ने जो नई नीति जारी की है उसमें अंकों के आधार पर समाचार पत्रों को विज्ञापन सूची में वरीयता क्रम में विज्ञापन देने के लिए चयन करने की बात कही गई है। सूचना प्रसारण मंत्रालय के डीएव्हीपी द्वारा दिनांक १५ जून को जो पत्र जारी किया गया है उसमें एबीसी और आरएनआई का प्रमाण पत्र २५ हजार प्रसार संख्या से अधिक वाले समाचार पत्रों के लिए अनिवार्य किया गया है । इसके लिए २५ अंक रखे गए हैं । इसी तरह कर्मचारियों की पीएफ अंशदान पर २० अंक रखे गए हैं । समाचार पत्र की पृष्ठ संख्या के आधार पर २० अंक निर्धारित किए गए हैं। समाचार पत्र द्वारा जिन ३ एजेंसियों के लिए १५ अंक निर्धारित किए गए हैं। स्वयं की िंप्रिंटग प्रेस होने पर १० अंक और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रसार संख्या के आधार पर फीस जमा करने पर १० अंक दिए गए हैं । इस तरह १०० अंक का वर्गीकरण किया गया है, जो वर्तमान में ९० फीसदी लघु एवं मध्यम समाचार पत्र पूरा नहीं कर सकते हैं।
इस नई विज्ञापन नीति के लागू होने के बाद बड़े राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक समाचार पत्रों को ही अब वेंâद्र एवं राज्य सरकारों के विज्ञापन जारी हो सवेंâगे। लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र डीएवीपी की विज्ञापन सूची से या तो बाहर हो जाएंगे या उन्हें साल में १५ अगस्त २६ जनवरी के ही विज्ञापन मिल पाएंगे। सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा विज्ञापन नीति २०१६ के अनुसार २५ हजार से ऊपर प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों को ३० जून तक नई विज्ञापन नीति के अनुरूप ऑनलाइन जानकारी भरने को कहा गया है। इस पत्र में यह भी कहा गया है कि जिन समाचार पत्रों को ४५ अंक से कम प्राप्त होंगे, उन समाचार पत्रों को विज्ञापन सूची से पृथक किया जा सकता है। नई विज्ञापन नीति में डीएवीपी देश के ९० फीसदी भाषाई समाचार पत्र डीएवीrपी की विज्ञापन सूची से बाहर हो जाएंगे।

-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात
वेंâद्र एवं राज्य सरकारें विज्ञापन के बल पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पूरी तरह नियंत्रित कर पाने में सफल हुई हैं। अब यही प्रयोग िंप्रट मीडिया पर लागू किया गया है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जो नई विज्ञापन नीति जारी की गई है। उसके लागू होने के बाद देशभर के राष्ट्रीय स्तर के करीब एक दर्जन समाचार-पत्र तथा प्रादेशिक स्तर के लगभग १०० समाचार पत्र ही अब वेंâद्र सरकार के विज्ञापनों पर प्राथमिकता से हक अधिकार रख पाएंगे। डीएवीपी व्यवसायिक दृाqष्ट को अपनाते हुए केवल उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी करेगी जिनकी पृष्ठ संख्या काफी ज्यादा है और काफी बड़े समाचार पत्र हैं। उन्हें ही विज्ञापन जारी करेगी। सरकार की इस नीति से भाषाई अखबार जो बड़े पैमाने पर विभिन्न प्रदेशों से भाषा के आधार पर कई दशकों से प्रसारित हो रहे हैं और उनका जनमानस में बहुत बड़ा असर है। अब इनको विज्ञापन मिलना संभव नहीं होगा ।

-डीएवीपी को आधार मानती है देश की सभी राज्य सरकारें
डीएवीपी के रेट को आधार मानकर राज्यों में उन्हीं समाचार पत्रों को विज्ञापन प्राथमिकता से जारी करते हैं जो डीएवीपी की सूची में दर्ज है । उनके रेट डीएवीपी ने मान्य किए हैं। नई नीति में देश के ९० फीसदी लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र अब सूची से बाहर हो जाएंगे। इस ाqस्थति में उन्हें राज्य सरकारों के विज्ञापन भी नहीं मिल पाएंगे ।

-सुनियोजित षड्यंत्र
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा २०१६ में जारी की गई है। नीति में षड्यंत्र की बू आ रही है। समाचार पत्र संचालकों के अनुसार इसमें मात्र तीन समाचार एजेंसी को मान्यता दी है। जबकि पिछले १० वर्षों में भाषाई एजेंसियां बड़े पैमाने पर काम कर रही हैं। उनकी सेवाएं हजारों समाचार पत्र ले रहे हैं। उन्हें नई नीति में अनदेखा किया गया है।
६००० से ७५००० की प्रसार संख्या वाले समाचार पत्रों के लिए अभी तक सीए (चार्टर्ड एकाउन्टेंट) का प्रमाण पत्र लेना अनिवार्य था। नई नीति में २५००० से ७५००० तक के समाचार पत्रों को एबीसी अथवा आरएनआई से प्रसार संख्या प्रमाणित कराने की अनिवार्यता रखी गई है। मात्र १५ दिनों के अंदर यह प्रमाण पत्र प्राप्त कर पाना किसी भी समाचार पत्र के लिए संभव नहीं है । एबीसी और आरएनआई के लिए भी हजारों समाचार पत्रों की प्रसार संख्या का ऑडिट कर पाना संभव भी नहीं है। नई व्यवस्था में जान-बूझकर इस तरीके के प्रावधान रखे गए हैं जो लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों द्वारा न तो पूरे किए जा सकते हैं ना ही उन पर लागू होते हैं । ऐसी ाqस्थति में नए नियमों में २५००० से ७५००० संख्या वाले समाचार पत्रों को २५ से ३० अंक मिलना भी संभव नहीं होगा। डीएवीपी ने न्यूनतम ४५ अंक अनिवार्य किया है। लघु एवं मध्यम समाचार पत्रों द्वारा इस नीति का व्यापक विरोध किया जा रहा है। समाचार एजेंसी को कई प्रादेशिक संगठनों एवं समाचार पत्र संचालकों द्वारा बताया गया है कि यह नीति स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति पर अभी तक का सबसे बड़ा आघात माना जा सकता है। कई समाचार पत्र मालिकों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों का यह एक बहुत बड़ा षडयंत्र है। जिस तरह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विज्ञापन देकर सरकारों ने अपना नियंत्रण कर लिया है। उसी तरह अब िंप्रट मीडिया को नियंत्रित करने भाषाई अखबारों को समाप्त करने का षड्यंत्र रचा गया है । जिसका भारी विरोध समाचार पत्र संचालक कर रहे हैं । इस नीति के लागू होने से देश के लगभग १ लाख पत्रकारों के बेरोजगार होने की संभावना बन गई है।