शिक्षा मंत्री तावड़े की शिक्षा पर सवाल


मुंबई। महाराष्ट्र के शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े की इंजिनियरिंग की शिक्षा पर सवाल उठने से वे मुश्किल में आ गए हैं। तावड़े ने पुणे की जिस ज्ञानेश्वर विद्यापीठ (यूनिवर्सिटी) से बीई (इलेक्ट्रॉनिक्स) की डिग्री ली है, यह विद्यापीठ फर्जी है। उसे सरकार ने मान्यता ही नहीं दी है। एक टीवी चैनल पर इस खबर के सामने आने के बाद मुंबई के राजनीतिक गलियारों में गहमागहमी बढ़ गई है। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि तावड़े सिर्फ १२वीं पास हैं और अब तक खुद को इंजिनियर बताते रहे हैं। मुंबई कांग्रेस ने तादवड़े को मंत्रिमंडल से हटाने और उन्हें गिरफ्तार करने की मांग कर डाली। मुंबई के कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरुपम ने कहा, `२००५ में कोर्ट ने ज्ञानेश्वर विद्यापीठ की डिग्री को फर्जी घोषित कर दिया था। इसके बावजूद विनोद तावड़े ने २०१४ में अपने इलेक्शन ऐफिडेविट में इस डिग्री का उल्लेख किया। क्या यह गुनाह नहीं है? निरूपम ने कहा कि बीजेपी ने दिल्ली से लेकर मुंबई तक फर्जी डिग्री वालों को शिक्षा मंत्री बनाने की नई परंपरा शुरू कर दी है। अब यह बात उजागर होने के बाद तावड़े को शिक्षा मंत्री के पद से तुरंत इस्तीफा देना चाहिए। अगर वह इस्तीफा नहीं देते, तो सीएम को उन्हें तुरंत बर्खास्त करके जेल भेज देना चाहिए।’ इस मामले के सामने आने के बाद सोमवार की शाम मंत्रालय में एक प्रेस कॉन्प्रâेंस बुलाकर विनोद तावड़े ने अपनी सफाई पेश की। तावड़े ने माना कि उनकी डिग्री को सरकारी मान्यता प्राप्त नहीं है, लेकिन उन्होंने कभी अपनी डिग्री को छुपाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने ऐफिडेविट में इस बात का उल्लेख किया है कि उनकी इंजिनियरिंग की डिग्री पुणे की ज्ञानेश्वर विद्यापीठ की है। तावड़े ने कहा, ‘मैं पुणे दयानेश्वर विद्यापीठ का छात्र रहा हूं और मुझे इसपर गर्व है। मैंने विश्वविद्यालय से जो डिग्री हासिल की थी उसे कभी नहीं छिपाया।’ तावड़े ने कहा, ‘विद्यापीठ में एक ब्रिज कोर्स शुरू किया गया था जिसका लक्ष्य सैद्धांतिक जानकारी के साथ छात्रों को प्रायोगिक जानकारी देना था। मैंने १९८० में पाठ्यक्रम में दाखिला लिया और १९८४ में पास किया। पाठ्यक्रम में पार्ट टाइम शिक्षा और पार्ट टाइम इंटर्नशिप दी जाती है।’ मंत्री ने कहा, ‘छात्रों से दाखिला लेते वक्त कहा गया था कि पाठ्यक्रम सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। मैं इसे जानता था और मैंने इसे स्वीकार किया।’ उन्होंने कहा कि मनोहर जोशी के विद्यापीठ का कुलाधिपति बनने के बाद उनके प्रतिद्वंद्वी अदालत में गए और अदालत ने पाठ्यक्रम को प्रतिबंधित कर दिया।