यूपी में राजनीतिक बिखराव से भाजपा को फायदा


लखनऊ। भाजपा यूपी में अपना दल के जरिए पिछड़ों के वोट में सेंध लगाना चाहती है। लिहाजा गठबंधन के अपना दल की हर रैली में वह अपनी पूरी ताकत झोंक रही है।
ज्ञात रहे कि उत्तर प्रदेश में र्कुिमयों के ८ ज्ञ् वोट हैं। अगर इसमें कोईरी, काछी, कुशवाहा जैसी जातियां और जोड़ दें तो पूर्वांचल के बनारस, चंदौली, मि़र्जापुर, सोनभद्र, इलाहाबाद, कानपुर, कानपुर देहात की सीटों पर यह वोट बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं। इसीलिए २०१४ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने गठबंधन किया था जिसका असर भी दिखा और भाजपा ने ७३ सीटें जीतीं। अब एक बार फिर उसी समीकरण को भाजपा नई धार के साथ अपनाना चाहती है, पर इसमें एक पेंच भी है कि अपना दल दो भागों में बंट गया है।
उधर यूपी में बिहार फार्मूले की जमीन तैयार करने में ही गैरभाजपाई दल बिखरे दिख रहे हैं। गठबंधन के नाम पर दल अपनी डपली अपना राग वाली राह पर चल निकले हैं। प्रमुख दल सपा, बसपा, कांग्रेस और रालोद अलग अलग चुनाव लड़ने की बात करने लगे हैं। माना जा रहा है कि अगर सभी दल एकला चलो की रणनीति पर आगे बढ़े तब भाजपा की घेराबंदी उनके लिए मुाqश्कल हो सकती है। बिहार फार्मूले को २०१७ में यूपी में आजमाने की मंशा रखने वाले राजनीतिक दल अब एकला चलो की राह पर चलते दिख रहे हैं।
बिहार के सीएम नीतीश कुमार की पहल थी कि यूपी में कांग्रेस, सपा, रालोद और जेडीयू के साथ चुनाव लड़े। उनका मानना था कि बसपा का साथ मिल जाए तो सोने पर सुहागा रहेगा। इस दिशा में प्रयास शुरू भी किए गए। शुरूआती दौर में ही जेडीयू और रालोद के एका की कोशिश की गई, लेकिन जेडीयू-रालोद की दोस्ती पहले पायदान पर यह नाकाम साबित रही। बसपा मुखिया मायावती भी काफी दिन पहले साफ कर चुकी हैं कि वह किसी दल के साथ चुनाव नहीं लड़ेगी।