मुर्गा दंगल को मनाही तो जल्लीकट्टू को अनुमति क्यों ?


नई दिल्ली । आँध्रप्रदेश में मकर संक्रांति के अवसर पर मुर्गों की लड़ाई पर प्रतिबन्ध रहेगा किन्तु पड़ौसी राज्य तमिलनाडु में इस अवसर पर सांडों को काबू में करने और सांड तथा बैलों की दौड़ों से जुड़े अन्य लोकप्रिय खेल आयोजित किये जायेंगे। एक ही अवसर पर दो राज्यों में दो तरह के आदेश एक न्यायालय द्वारा और दूसरा वेंâद्र द्वारा, कई सवाल पैदा कर रहा है। पेटा इंडिया ने कहा है कि व्रूâरता के खिलाफ जल्लीकट्टू से रोक हटाना राष्ट्र के लिए एक `काला धब्बा’ है और वह इस पैâसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रूख करेगी। पीपुल्स फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) इंडिया ने कहा कि भाजपा समर्थक भी इस बात को लेकर िंचतित हैं कि जो लोग मवेशियों के शुभिंचतक होने का दावा करते थे वे अब उन पर व्रूâरता होने दे रहे हैं जबकि उच्चतम न्यायालय ने इस पर प्रतिबंध लगाया था।
पर्यावरण मंत्रालय ने खुद २०११ में सांडों के इस्तेमाल वाले कार्यक्रमों पर रोक लगा दी थी और मवेशियों के प्रति व्रूâरता की रोकथाम अधिनियम के तहत १९६० से जल्लीकट्टू, सांड की दौड़ और सांड की लड़ाईयां गैरकानूनी हो गयी थीं। लेकिन अब केन्द्र ने सांडों को काबू में करने के खेल जल्लीकट्टू को मंजूरी देने के लिए एक अधिसूचना जारी की जिसके बाद यह प्रतिक्रिया सामने आयी है। तमिलनाडू में राजनीतिक दलों द्वारा यह प्रतिबंध हटाए जाने की व्यापक तौर पर मांग की जा रही थी। इस राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि राजनीतिक लाभ के लिए पशुओं को कष्ट में डाला जायेगा।