भाजपा को कर्नाटक में कुशल नेतृत्व की तलाश


बेंगलुरु। कर्नाटक में खोई हुई जमीन फिर से हासिल करने में जुटी भारतीय जनता पार्टी पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का असर साफ साफ देखा जा सकता है। पार्टी कर्नाटक में साफ सुथरी छवि के युवा नेताओं की तलाश में जुटी है ताकि राज्य में महाराष्ट्र के देंवेंद्र फडणवीस मॉडल को सफलतापूर्वक लागू किया जा सके।
दिल्ली भाजपा सूत्रों के अनुसार, पार्टी राज्य में अपनी खोई हुई ाqस्थति वापस पाने के लिए पूरी तरह से कमर कस चुकी है और इसी वजह से पार्टी ने लंबे समय से स्थगित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक को बेंगलुरु में करने का पैâसला लिया है। आमतौर पर भाजपा उन राज्यों में कार्यकारिणी की बैठक बुलाती है, जहां उसकी सरकार है लेकिन इस बार भाजपा ने बेंगलुरु में बैठक बुलाने का पैâसला किया है।
दिल्ली भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मानना है कि पार्टी के लिए कर्नाटक को फिर से जीतना बेहद अहम है। लेकिन महाराष्ट्र की तरह ही राज्य के पुराने नेता कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह से तैयार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पिछले साल नवंबर में कम से कम दो से तीन ऐसे नामों पर विचार करने का निर्देश दिया था जिन्हें २०१८ में होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी के चेहरे के तौर पर पेश किया जा सके। तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राजनाथ िंसह ने २०१३ में देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र भाजपा का प्रेजिडेंट बनाया था और उस वक्त २०१४ के लोकसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जा चुके थे। मोदी ने सुधीर मुंगातिवार के बदले फडणवीस के नाम को तरजीह दी थी। मुंगातिवार को वेंâद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का करीबी माना जाता है। पार्टी प्रवक्ता और विधायक एस सुरेश कुमार, करकाला के विधायक वी सुनील कुमार और हुबली-धारवाड़ पाqश्चम के विधायक अरिंवद बेल्लाड़ के नाम पर भाजपा विचार कर रही है। हालांकि आंतरिक गुटबाजी रोकने के लिए अभी तक किसी नाम पर अंतिम मुहर नहीं लगाई गई है। सूत्र ने बताया, ‘सुरेश कुमार जाना पहचाना नाम है, जबकि सुनील कुमार बजरंग दल कार्यकर्ता रह चुके हैं। अरिंवद बेल्लाड़ िंलगायत समुदाय से आते हैं, जो पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा का भरोसेमंद वोट बैंक माना जाता है। िंलगायत समुदाय ने येदियुरप्पा के आने के बाद २०१४ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में मतदान किया था। साफ है कि पार्टी अपने आप को िंलगायत वोट बैंक का बंधक बनाकर नहीं रखना चाहती।’ आर्कावर्थी डिनोटिफिकेशन के मामले में भाजपा सिद्धारमैया की कांग्रेस सरकार को टारगेट नहीं कर पाई। भले ही भाजपा ने विपक्षी दल के तौर पर विधानसभा में हंगामा किया, लेकिन वह इस मामले को अपने पक्ष में नहीं भुना पाई। भाजपा कर्नाटक सरकार के रुख को खारिज तक नहीं कर पाई। पार्टी अभी से शुरुआत करती हैं तो वर्ष २०१८ तक सफलता मिलेगी।