भाजपा-किरण की दोस्ती का अब हो जाएगा अंत


नई दिल्लीr । दिल्ली विधानसभा का चुनाव भाजपा हार गई। वे खुद भी कृष्णा नगर से चुनाव हारीं। जानकारों का कहना है कि वे बेहद महत्वाकांक्षी किस्म की इंसान है। अगर उन्हें किसी जगह से कुछ मिलने की उम्मीद नहीं रहती तो वे उससे दूर हो जाती हैं। अब उन्हें भाजपा से कुछ भी मिलने के उम्मीद नहीं है। भाजपा को भी उनकी हैसियत का अंदाजा हो गया है। इसलिए हो सकता है कि दोनों की कुछ समय तक रही दोस्ती का भी अब अंत हो जाए। तय करें अपना रोल दिल्ली भाजपा के प्रभारी सतीश उपाध्याय ने कल एक इंटरव्यू में कहा कि अब किरण बेदी को खुद तय करना है कि वे पार्टी में किस तरह से एक्टिव होना या रहना चाहती हैं। उन्होंने किरण बेदी के भाजपा से आगे के संबंधों पर इससे ज्यादा कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया। खाली दफ्तार जानकारों का कहना है कि दिल्ली भाजपा के दफ्तर में बना उनका कमरा फिलहाल खाली पड़ा है। उनके भाजपा में शामिल होते ही उसे आनन-फानन में तैयार कर दिया गया था। उसमें तमाम आधुनिक सुविधाएं उपल ब्ध करवा दी गईं थीं। पर किरण बेदी चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद से ही नदारद है। नतीजे घोषित होने के बाद से ही नदारद वे कल भाजपा प्रमुख अमित शाह के पुत्र की दिल्ली में आयोजित भोज में भी नहीं दिखीं। हालांकि इस अवसर पर बड़ी तादाद में भाजपा और दूसरे दलों के नेता मौजूद थे। एनजीओ में होंगी एक्टिव किरण बेदी को जानने वाले कहते हैं कि वह अब फिर से अपने एनजीओ को वक्त देने लगेंगी। राजनीति की मारामारी वब नहीं झेली सकती। वह देश-विदेश में विभिन्न विषयों पर बोलने के लिए भी जाती रहेंगी। एनजीओ को वक्त देने लगेंगी जानकारों का कहना है कि अगर वे भाजपा में एक्टिव भी होना चाहेंगी तो उन्हें पार्टी के पुराने नेता आगे नहीं आने देंगे। उनकी खिंचाई करेंगे। सबको मालूम चल गया है कि उनके पास ना तो आधार है और ना ही उनमें नेता बनने के लिए जरूरी गुण ही हैं।