पीडीपी और बीजेपी के गठबंधन पर महबूबा मुफ्ती ने साधी चुप्पी


नई दिल्ली। कद्दावर नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद के इंतकाल के बाद एक बार फिर घाटी में पीडीपी और बीजेपी के बीच गठबंधन टूटने की आशंका जताई जा रही है। भावी सीएम और मरहूम सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती ने मौन साध रखा है वहीं बीजेपी भी उहापोह में है। कयासों का दौर जारी है। पर सच क्या है। क्या घाटी में पीडीपी और बीजेपी की दोस्ती बनी रहेगी। जानकारों की मानें तो हाल फिलहाल बीजेपी-पीडीपी गठबंधन टूटने के कोई आसार नहीं है। खासतौर पर पीडीपी की ओर से। इसकी दो वजह हैं। पहली महबूबा ऐसा करके अपने पिता को गलत साबित नहीं करना चाहेंगी, दूसरा केंद्र की तरफ से जो वित्तीय और प्रशासनिक मदद उन्हें मिल रही है वो उसे खोना नहीं चाहेंगी। फिर सवाल उठता है कि गठबंधन को लेकर महबूबा ने ये चुप्पी क्यों साध रखी है। दरअसल इसकी जड़ में बीजेपी की ओर से धारा ३७० और दो झंडों को लेकर अपनाया गया रुख है। दरअसल जब दोनों पार्टियों में समझौता हुआ था तो कहा जाता है कि तीन मुद्दों पर सहमति बन गई थी कि बीजेपी धारा ३७०, दो झंडे और आर्टिकल ३५ए पर मौन रहेगी। लेकिन पिछले कुछ महीनों में ऐसा होता नजर नहीं आया। एक्सपर्ट की नजर में महबूबा की खामोशी अपने गठबंधन सहयोगी को इन मुद्दों पर अपना रुख साफ करने का दबाब डालने की एक रणनीतिक कोशिश है। महबूबा चाहकर भी ये जोखिम मोल नहीं ले सकतीं कि ये तीन मुद्दे उनका गठबंधन सहयोगी लगातार उठाता रहे। पीडीपी की स्थिति राज्य में पहले जैसे मजबूत नजर नहीं आती। इसका एक उदाहरण तब देखने को मिला जब मुफ्ती साहब की अंतिम रस्म में बहुत कम लोग जुटे। ये पार्टी के लिए चिंता पैदा करने वाला है। वहीं पार्टी के अंदर ही एक बड़ा धड़ा बीजेपी विरोधी है वो शुरू से ही बीजेपी के खिलाफ रहा है। इसमें तारिक अहमद करा और अल्ताफ बुखारी जैसे लोग हैं साथ ही हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि पार्टी में हसीब जैसे संघ समर्थक लोग भी मौजूद हैं। अंत में गठबंधन बीजेपी और पीडीपी के लिए मजबूरी की तरह है। दोनों में से कोई भी इसे अलग हटकर अपने लिए मुसीबत मोल लेना नहीं चाहता लेकिन दबाव बनाने की रणनीति जरूर जोरशोर से जारी है।