जैवविविधता के लिए खतरा बना विलायती बबूल


०देशी जन्तुओ सहित पादपों की लगभग ५०० प्रजातियां विलुप्त की कगार पर
नईदिल्ली। ‘बोया पेड़ बबूल का, आम कहां से खाय’ संत कबीर के दोहे की यह पंक्ति विलायती बबूल की पूरी कहानी बयां कर देती है। अंग्रेजी राज में विलायती बबूल हरियाली बढ़ाने के लिए लगाया गया था लेकिन आज यह नासूर बन गया है। यह न सिर्पâ देश की जैवविविधता के लिए बड़ा खतरा है बाqल्क पर्यावरण पर भी बोझ बन गया है। राजधानी दिल्ली सहित दर्जनभर राज्यों में पैâला विलायती बबूल देशी पेड़-पौधों की लगभग ५०० प्रजातियों को खत्म कर चुका है। अगर इसे समय रहते नहीं मिटाया गया तो देशी पेड़-पौधों की रही-सही प्रजातियां भी खत्म हो जाएंगी, शुष्क क्षेत्रों में जल संकट गहरा सकता है, वायु प्रदूषण बढ़ जाएगा। परेशान किसानों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इसे हटाने की मांग शुरू कर दी है। बुलंदशहर जिले के गांव औरंगा निवासी लवकुश चौधरी ने बताया कि उनके गांव में करीब ६०० एकड़ क्षेत्र में विलायती बबूल के पेड़ हैं। सरकार ने कहा था कि पूâल और फलदार वृक्ष लगाए जाएंगे लेकिन वहां विलायती बबूल लगा दिए गए। अब यह कांटेदार जंगल न तो लोगों के उपयोग का है, न वन्य जंतुओं के अनुवूâल। इसे हटाकर पूâल व फलदार वृक्ष लगने चाहिए। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोपेâसर और पूर्व प्रो-वाइस चांसलर सी आर बाबू लंबे समय से विलायती बबूल के पर्यावरण और जैवविविधता पर दुष्प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। प्रोपेâसर बाबू ने कहा कि विलायती बबूल भारत में आने के बाद अब तक देशी पेड़-पौधों की ५०० प्रजातियों को खत्म कर चुका है। खेजड़ी, अंतमूल,केम, जंगली कदम, कुल्लू, आंवला, हींस, करील और लसौड़ा सहित सैकड़ों देशी पौधे अब दिखाई नहीं देते। इसकी हरियाली के फायदे कम, नुकसान ज्यादा हैं। जिस जमीन पर यह पैदा होता है वहां कुछ और नहीं पनपने देता। इसकी पत्तियां छोटी होती हैं। इसका पर्यावरण की दृाqष्ट से भी कोई उपयोग नहीं है। बहुत कम कार्बन सोखता है। दिल्ली के रिज क्षेत्र में इस पर अंकुश लगाने का पायलट प्रयोग कर रहे बाबू कहते हैं कि विलायती बबूल से पक्षियों की प्रजातियां भी काफी कम हो गई हैं। रिज क्षेत्र में पहले करीब ४५० प्रजातियां थी जो घटकर केवल १०० रह गर्इं। उनका पायलट प्रयोग शुरु होने के बाद पक्षियों की संख्या पुनः बढ़ी है। प्रोपेâसर बाबू ने कहा, लोग इसके दुष्प्रभावों से वाकिफ नहीं थे। लेकिन अब सरकार को इसे खत्म करने के लिए अविलंब कदम उठाने चाहिए। विलायती बबूल हटा कर देशी प्रजातियों के पौधे लगाए जाएं। अगर रिज क्षेत्र में देशी प्रजाति के पेड़ होते तो आज प्रदूषण का स्तर इतना अधिक नहीं होता। अप्रâीकी महाद्वीप में इथियोपिया के रेगिस्तानी और अर्धरेगिस्तानी इलाकों में भी स्थानीय लोगों ने विलायती बबूल के परेशान होकर इसे जड़मूल से मिटाने की मांग की है। अदीस अबाबा ाqस्थत इंस्टीटयूट ऑफ बॉयोडाइर्विसटी वंâजरवेशन के पारिाqस्थतिकीय विभाग ने इसके विपरीत प्रभावों के बारे में अध्ययन किया। संस्थान ने पाया कि देशी जानवरों और पौधों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है जिसके चलते जैवविविधिता कम हो गई। ब्राजील में भी अध्ययन हुए जिससे पता चला कि इसके कारण देशी प्रजातियां खत्म हो रही हैं।