गोवा की हरियाली का दुश्मन आईपीबी


गोवा में भाजपा सरकार ने किसी तरह अवैध उत्खनन को बहुत हद तक नियंत्रित कर लिया किन्तु अब गोवा इनवेस्टमेंट प्रोमोशन एंड पैâसिलिटेशन बोर्ड (आईपीबी) ने जिस तरह से औद्योगीकरण को र?्तार दी है उससे गोवा की हरियाली को ऩजर लग गयी है। खबर है कि आईपीबी ने महज ९ बैठकों में कई प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई है।
जिनमें ७,००० करोड़ रुपये से अधिक की ७१ परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी है। अक्टूबर २०१४ में गठित आईपीबी की यह र?्तार उस गोवा को भारी पड़ सकती है जहाँ नारियल को वृक्ष मानने से इंकार कर दिया गया था।
जिन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गयी है उनमें चार पांच सितारा होटल प्रोजेक्ट्स भी शामिल हैं और इन्हें बारदेज क्षेत्र में तटीय इलाकों में बनाया जाना है। इसके अलावा इसमें एक मॉल को भी बनाए जाने की मंजूरी दी गई है। मैन्युपैâक्चिंरग और फॉर्मास्यूटिकल्स यूनिट्स के अलावा सबसे ज्यादा होटल प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई। इनमें से अधिकांश परियोजनाएं नो डिवेलपमेंट जोन और उन इलाकों में शामिल हैं जहां नैचुलर कवर बहुत ज्यादा है। आईपीबी उन इलाकों में जमीन देने के लिए कुख्यात है जहां उसकी मंजूरी नहीं है। आम तौर पर आईपीबी वन्य जमीन का आवंटन कर देती है। इस वजह से नारियल के पेड़ और काजू की खेती वाले इलाकों को रातों रात कृषि भूमि से औद्योगिक भूमि में बदल दिया गया। डिस्टलिरी को मंजूरी दिए जाने का मामला महज इस मामले का छोटा हिस्सा है. २१ जनवरी को एक पांच सितारा होटल प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई जो मलिम इलाके में ३५,००० वर्गमीटर का इलाका है और इसे नो डिवेलपमेंट जोन करार दिया गया है। दूसरे होटल और विला प्रोजेक्ट के लिए २०,००० वर्गमीटर के बागवानी इलाकों को कर्मिशयल यूज में तब्दील कर दिया गया।
आईपीबी को गोवा इनवेस्टमेंट प्रोमोशन एक्ट २०१४ से ताकत मिलती है। कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक यह कानून खामियों से भरा हुआ है और गैर संवैधानिक है। इसके तहत आईपीबी राज्य, नगर और गांव के स्तर पर बने सभी कानूनों को नजरअंदाज कर औद्योगिक वृद्धि की खातिर प्रोेजेक्ट्स को मंजूरी दे सकता है जिन्हें ७३वें और ७४वें संवैधानिक संशोधन के तहत गांवों और नगरों को दिया गया है।