एक आंदोलन के दो चेहरे आमने-सामने


अन्ना के दो साथी : किरण और केजरीवाल
नई दिल्ली। एक आंदोलन के दो चेहरे। बेशक अबतक बतौर मुख्यमंत्री किरण बेदी की दावेदारी पर फैसला नहीं हुआ है, लेकिन बीजेपी के पोस्टर, बैनर और नारों में किरण बेदी की मौजूदगी कुछ बड़े इशारे कर रही है। जो कहानी कभी बदलाव की इन आवाजों से शुरु हुई थी वो कहानी अब नई तस्वीरों पर आकर थम चुकी हैं। तस्वीर आज के अन्ना की है। अब न वो नारे साथ हैं न वो कैमरे साथ हैं न वो जनता साथ है और न ही वो टीम साथ हैं। अन्ना आज भी उस मोड़ पर रुके हैं, लेकिन अन्ना के साथी एक ही मंजिल के दो नए रास्ते तलाश चुकी हैं। एक तरफ केजरीवाल हैं जो आदर्शवाद के आंदोलन से अवसरवाद की सियासत तक पहुंच गए। तो दूसरी तरफ हैं किरण बेदी, जो अब एक नई सियासत का नया चेहरा बनकर सामने हैं। एक ही राह के वो दो मुसाफिर आज दिल्ली की राजनीति में आमने-सामने आ चुके हैं। सियासत अलग है, मुद्दे अलग हैं, नारे अलग हैं और फितरत भी अलग। उम्मीद की नई किरण से बीजेपी कार्यकर्ताओं को जोश दोगुना है। अबतक दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर किरण बेदी के नाम का ऐलान नहीं हुआ है लेकिन १९ जनवरी को बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में ये ऐलान भी हो सकता है। आलम ये है कि एक आंदोलन को राजनीति में बदलने वाली केजरीवाल एंड कंपनी को अब किरण बेदी का राजनीति में आगाज हजम नहीं हो रहा है। किरण बेदी इस कारवां की अकेली मुसाफिर नहीं हैं। बल्कि वो शाजिया इल्मी भी अब बीजेपी में शामिल हो चुकी हैं, जो कभी अन्ना के आन्दोलन में आवाजों बुलंद कर रहीं थीं। सवाल किरण बेदी के राजनीति में आने का नहीं है। सवाल शाजिया के पाला बदलने का भी नहीं है। सवाल ये है कि आखिर ये नौबत आईं क्यों। क्या केजरीवाल की पार्टी चंद नेताओं का ही गुट बनकर रह गई है। क्या वाकई पार्टी के भीतर केजरीवाल की तानाशाही, तमाम नेताओं की घुटन बन रही है। क्या वो नेता अब केजरीवाल से दूर हो रहे हैं कि जिन्हें इमान से समझौता अब मंजूर नहीं। विनोद बिन्नी, स्वामी अग्निवेश, जनरल वी के सिंह, किरण बेदी और शाजिया इल्मी भी। क्या ये सबकुछ केजरीवाल के लिए एक इशारा तो नहीं कि देश को बदलने की राजनीति से पहले खुद को बदलना जरूरी है।