इन कानूनों पर रोक लगाना चाहते है पश्चिमी देश!


इन कानूनों पर रोक लगाना चाहते है पाqश्चमी देश! (२५आरएस१७ओआई)
नईदिल्ली (ईएमएस)। भारत-अमेरिका के बीच यूपीए-१ के कार्यकाल में हुए परमाणु समझौते के बाद अब ठहराव दिखता है। रिश्तों को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए उचित शर्तों के साथ संवेदनशील तकनीक साझा करने का मसला निाqश्चत तौर पर बेहद अहम है। अमेरिकी नई और संवेदनशील तकनीक साझा करने के इच्छुक होगें, लेकिन जब उनकी `िंचताओं’को दूर कर दिया जाए। संवेदनशील तकनीक साझा करने का यह मसला उन तमाम मसलों का ही हिस्सा है, जिसमें भारत को अपने हित से कुछ बड़े समझौते करने पड़ेंगे। इनमें से कुछ समझौते निाqश्चत तौर पर मोदी के लिए राजनीतिक र्आिथक जोखिम पैदा करने वाले हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका चाहता है कि दवा क्षेत्र को संचालित करने वाले भारत के पेटेंट कानून की समीक्षा हो। यह कानून महामारी की ाqस्थति में गरीब लोगों के लिए किसी भी दवा की सस्ती किस्म के उत्पादन का अनिवार्य लाइसेंस देता है। इस कानून को विकासशील देशों में काफी सराहा है, लेकिन पाqश्चमी दवा वंâपनियां इस पर प्रतिबंध की मांग कर रही हैं। यह एक जटिल मुद्दा है और सबसे पहले संघ परिवार से जुड़े तत्व ही ऐसे किसी भी कदम का विरोध करेंगे।

० एफडीआई के खिलाफ नहीं मोदी
वैश्विक दवा वंâपनियां हमारे पेटेंट कानून के उस प्रावधान को भी नापसंद करती हैं, जिसके तहत उन्हें किसी दवा के मूल्य में मनचाही वृद्धि की अनुमति नहीं है और न ही उसका पेटेंट करवा सकती हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं, जिस पर दोनों देशों के बीच सौदे की गाड़ी पटरी से उतर सकती है। जहां तक परमाणु उत्तरदायित्व कानून का मसला है तो आशा जताई जा रही है कि भारत सरकार कानून में बदलाव किए बिना कोई रास्ता निकाल ले। इसमें सरकार की तरफ से अमेरिकी आर्पूितकर्ता को लिखित में गारंटी दी जा सकती है, जिससे कि आर्पूितकर्ता का दायित्व कम हो जाए। दोनों देशों के बीच नए द्विपक्षीय निवेश समझौते की संभावित घोषणा की भी चर्चा है। लेकिन, किसी भी द्विपक्षीय निवेश समझौते पर चर्चा के दौरान दोनों देशों के बीच बौद्धिक संपदा अधिकार पर विवाद का उठना तय है। यह भी तय है कि भारत मल्टी ब्रांड रिटेल, बीमा और बैंिंकग क्षेत्र को एफडीआई के लिए खोलने को तैयार हो जाए। हाल में पीएम मोदी से मिलने वाले प्रोपेâसर जगदीश भगवती ने हमें बताया कि सैद्धांतिक रूप से पीएम मोदी मल्टी ब्रांड रिटेल क्षेत्र में एफडीआई के बिल्कुल खिलाफ नहीं हैं। अगले कुछ सालों में इस क्षेत्र को खोला जा सकता है। लेकिन, तब भाजपा को यह स्पष्ट करना होगा कि जब मनमोहन सरकार ने इसकी अनुमति दी थी तो उसने क्यों राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ रखा था।
० इसके खिलाफ है संघ परिवार
अमेरिकी वंâपनियां भारत में निर्माण क्षेत्र से अधिक सेवा क्षेत्र में प्रवेश की इच्छुक हैं। निर्माण के क्षेत्र में वे रक्षा और ग्रीन एनर्जी यानी सौर और परमाणु ऊर्जा तक ही सीमित रहना चाहती हैं। लेकिन, संघ परिवार बीमा और बैंिंकग सेक्टर को पूरी तरह से खोलने के किसी भी कदम के खिलाफ है। सैद्धांतिक रूप से संघ का मानना है कि भारतीय लोगों की बचत का इस्तेमाल केवल भारती वंâपनियां करें। हालांकि, ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि इन मसलों पर मोदी की संघ नेतृत्व के साथ परदे के पीछे कोई बातचीत हुई है। ये कुछ ऐसे राजनीतिक र्आिथक मसले हैं जिनका समाधान ढूंढे बिना द्विपक्षीय निवेश समझौते पर आगे नहीं बढ़ सकता है। भारत के हिसाब से देश में ही संयुक्त रक्षा उत्पाद इकाइयां लगाना सबसे कम विवादित मसला है। संघ परिवार भारत अमेरिका रक्षा समझौते का समर्थन कर सकता है, लेकिन यह एक पूरा पैकेज समझौता होगा। ऐसा नहीं होगा कि भारत इसमें से अपने हिसाब से कुछ का चुनाव कर ले और अन्य को छोड़ दे। यही भारत-अमेरिका संबंध में नए अध्याय लिखने की सबसे बड़ी चुनौती है।