जीडीपी में झोलझाल: कितना सही, कितना गलत


CP : the economic times

एक होती है जीडीपी, आजकल बहुत ही चर्चा में रहती है। कोई कुछ जानता हो या अनजान हो, दो चीज को लेकर सरकार का विश्लेषण फटाक से कर डालता है। उनमें से एक है जीडीपी ओर दूसरी महंगाई दर। तीसरी धीरे धीरे आजकल प्रचलन में आई है, लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के सर्वे के बाद कुछ ज्यादा ही चर्चा में है वो है बेरोजगारी की दर। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जीडीपी का ही रहता है। देश तरक्की पर है या नही, यह सब जानना चाहते है और इसका अनुमान वो जीडीपी से लगा लेते है।

ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानि सकल घरेलू उत्पाद किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का पैमाना या जरिया है। आपको बता दें कि भारत में जीडीपी की गणना प्रत्येक तिमाही में की जाती है। जीडीपी का आंकड़ा अर्थव्यवस्था के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में उत्पादन की वृद्धि दर पर आधारित होता है। जीडीपी के तहत कृषि, उद्योग व सेवा तीन प्रमुख घटक आते हैं। इन क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर तय होती है।

देश की तरक्की की असल रफ्तार क्या है? इस पर बहुत दिनों से विवाद चल रहा है। विवाद के पीछे है जीडीपी के आंकड़ों में झोलझाल। सरकार जीडीपी के आंकड़े कुछ बताती है ओर जानकार लोग कुछ और। इस बार सरकारी आंकड़ों पर सवाल उठाए हैं अरविंद सुब्रमण्यन ने।
वही अरविंद सुब्रमण्यन जो सितंबर 2014 से जून 2018 तक नरेंद्र मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं।

अरविंद सुब्रमण्यन ने कहा है कि देश उतनी स्पीड से आगे नहीं बढ़ रहा है, जितना दावा सरकार कर रही है। साल 2011-12 और 2016-17 के दौरान देश की तरक्की की रफ्तार बोले तो जीडीपी सिर्फ साढ़े चार फीसदी थी। इस दौरान आधिकारिक आंकड़ों में विकास दर 7 फीसदी के आसपास बताई गई थी। अरविंद सुब्रमण्यन ने पिछले साल एक बयान में नोटबंदी को भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका बताया था। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस वक्त नोटबंदी का ऐलान किया था, तब अरविंद सुब्रमण्यन ही देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे।

अब सोचने वाली बात यह है कि जब वो आर्थिक सलाहकार थे तब देश के जीडीपी के आंकड़े उनके कार्यकाल में ही जारी हुए थे तब तो वो नही बोले? अब हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च पेपर प्रकाशित कर रहे है। जब सलाहकार थे तब नोटबन्दी पर प्रधानमंत्री को नही टोका, अब उसे झटका बता रहे है। मैं कोई अर्थशास्त्री तो हूँ नही कि आपके आंकड़े समझ पाऊँ, पर एक पत्रकार होने के नाते मानसिकता जरूर समझ रहा हूँ। अगर देश को वाकई प्रेम करते हो तो चाहे कुर्सी पर रहो चाहे नही रहो, देश के प्रति सोच कल्याणकारी ही होनी चाहिए। अब थेथई करने से क्या फायदा? भारत के लिए कुछ अच्छा कीजिये, यही रहकर, रिसर्च पेपर अमेरिका में छपाने से देश का भला नही होगा।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय