दुविधा में दोनों नहीं इनके तो सुविधा की लालसा में दोनों गये


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एक कहावत है, ‘दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम’। पर कभी कभी सुविधा की चाह में भी दोनों जा सकते हैं। अगर यह उदाहरण देखना हो तो आप वो मिर्ची वाला यज्ञ करवाने वाले महामंडलेश्वर स्वामी वैराग्यानन्द जी को देख सकते हैं।

निरंजनी अखाड़े के द्वारा महामंडलेश्वर की उपाधि प्राप्त बाबाजी को पता नहीं क्या सुझा कि वो राम को छोड़ जगत की माया में उलझ गए। शायद सोचे होंगे कि उन्हें भी कुछ पद प्रतिष्ठा मिल जाएगी। इस चक्कर में वो यह भूल गए कि साधु को कंचन, कामिनी ओर कीर्ति से दूर रहना चाहिए। पर इन तीनों की चाह होती ही ऐसी है कि सतयुग से ही किसी को भी अपने जाल में फंसा लेती है। तो अब तो यह कलयुग है तो इसका प्रभाव तो ज्यादा ही रहने वाला है।

तो महाराज के साथ ही ऐसा हुआ कि माया के चक्कर में जो था वो भी गवां बैठे। मुझे एक दोहा याद आ गया जो सन्त रज्जब के लिए उनके सद्गुरु ने बोला था।

रज्जब तूने गजब किया, सिर पर बांधा मोर,
आया था हरि भजन करण को, चला नरक की ओर।।

अगर साधुत्व ग्रहण किया तो फिर संसार के चक्करों में क्यों फंसना। यह महाराज तो चक्कर में ऐसा फंसे वो भी राजनीति में, जिसमें कुछ भी निश्चित नहीं है, वो भी मोदी के दौर में, कि यह तक घोषणा कर बैठे कि राजा साहब नहीं जीते तो जीवित समाधि ले लूंगा।

अब यह कोई सामंती युग तो है नहीं कि राणाजी कह दे वही उदयपुर हो जाये। यह ठहरा लोकतंत्र वाला समय जिसमें जनता ही माई बाप होती है। जनता ने भी सोच लिया होगा कि चलो अबकी बार मिर्ची का यज्ञ करने वाले महाराज को समाधि लेते हुए देखते हैं। सो दे दी पटखनी राघोगढ़ नरेश को। अब महाराज की जान सांसत में आ गई। लोग फोन पर समाधि कब लेंगे, पूछने लगे।

अधूरे में पूरा कल निरंजनी अखाड़े ने कर दिया। स्पेशल किस्म का यज्ञ अनुष्ठान करने वाले महामंडलेश्वर स्वामी वैराग्यानंद को निरंजनी अखाड़े ने निष्कासित कर दिया।

अब महाराज की स्थिति वही हो गई, माया मिली न राम वाली। सोचे थे दिग्विजयसिंह जीत जाएंगे तो बड़ा रब्बो रुआब हो जाएगा। शायद कम्यूटर बाबा की तरह मंत्री संतरी ही बनवा देवें। पर जनता ने बाबा की समाधि देखने के चक्कर में साध्वी को जीता दिया और राजा साहब को घर बैठा दिया। घर से याद आया कि दिग्विजयसिंह ने अभी कुछ समय पहले ही शादी की थी। जब यह बाबाजी मिर्ची वाला यज्ञ कर रहे थे तो लोग मस्खरी करते थे कि यज्ञ चुनाव जीतने के लिए है या पुत्र प्राप्ति के लिए!?

लेकिन मेरी नजर में दिग्विजयसिंह उसी दिन हार गए थे जिस दिन भगवा पहनने वालों ने ठकुरसुहाती कहना चालू कर दिया था। और आपको तो मालूम ही है कि

सचिव बैद गुरु तीन जो, प्रिय बोलेही भय आस,
राज धर्म तन तिनि कर होहई बेगहि नाश।

तो दिग्विजयसिंह के लिए तो कई सन्त मोर्चा निकाल कर हवा में ही उन्हें जितवा रहे थे। ठकुरसुहाती बोल रहे थे। फिर तो यह होना ही था। लेकिन इन महात्मा जी के साथ भी बुरा हुआ जिसका हमे खेद है, कम से कम उन्हें फोन करके तो परेशान न करें। समाधि का समय न पूछें।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय।