शबरी के राम: समरस समाज के प्रेरक


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(शबरी जन्मजयंती विशेष)

भगवान श्रीराम के भक्तों का जब भी जिक्र होता है तो हनुमानजी महाराज का ध्यान सबसे पहले आता है। प्रभु के वनवास काल मे सर्वाधिक मदद करने वाले बजरंग बली पम्पा सरोवर के तट पर ऋष्यमूक पर्वत पर तत्कालीन समय वानरराज सुग्रीव के साथ निवास करते थे। जहाँ प्रभु श्री राम उनको मिले, तथा वही रामायण का माइल स्टोन भी है, वही से रावण का अंत लिखा गया था।

भगवान को वहां भेजने का कार्य जिसने किया वो एक भीलनी शबरी थी।

पंपा सरहि जाहु रघुराई।

तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥

 

मतलब की आप पम्पा सरोवर जाइये, जहां आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। सीधा ओर स्पष्ट है कि नर रूप में आये नारायण को उसकी भक्त निर्देश दे रही है कि आप ऐसा कीजिये, सोचिए उसकी भक्ति कितनी प्रबल होगी। इसलिए शायद प्रभु भक्तों का जब जिक्र होता है तो पवनसुत हनुमानजी के बाद शबरी का ही जिक्र आता है।

वही शबरी जो आदिवासी थी, समाज से उपेक्षित थी, लेकिन जिसके झूठे बैर प्रभु श्रीराम ने बड़े प्रेम से ग्रहण किये थे। आज उनकी जन्मजयंती है, फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को यह हर साल मनाई जाती है। उनकी जन्मतिथि पर उनके प्रति मेरे हृदय के भावों को आपके समक्ष आज रख रहा हूँ।

जन्म से भील कन्या शबरी बाल्यावस्था में ही अपने पिता के घर को छोड़ कर ऋषि मतंग के आश्रम में रहने लगी थी। कोमल हृदय ऋषि मतंग ने उसको उस समय आश्रय दिया था जब सभी उसकी जाति के कारण नकार चुके थे। अवस्थानुसार जब मतंग ऋषि अपने नश्वर शरीर का त्याग कर रहे थे तब उन्होंने अपनी शिष्या शबरी को यह निर्देश दिया कि एक दिन प्रभु श्री राम इस आश्रम पर आएंगे तथा तुझे कृतार्थ करेंगे। उसी दिन से शबरी को प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा हो गई। वो रोज आश्रम को साफ करती, पंथ संवारती, पुष्पो से मार्ग आच्छादित करती, जंगली बैर, कंदमूल लेकर आती तथा नित्य यह क्रियाकलाप करके प्रभु की प्रतीक्षा करती।

एक दिन उसकी प्रतीक्षा का सुखद परिणाम आया। प्रभु श्रीराम अपनी भार्या की खोज करते करते शबरी के आश्रम में पहुंचे। उस समय उस मिलन का वर्णन करने का मेरा शब्द सामर्थ्य नही है। बरसो की प्रतीक्षा जब फलीभूत होती है तो वह खुशी अवर्णनीय होती है।

गोस्वामीजी लिखते है :

प्रेम मगन मुख बचन न आवा।

पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥”

 

वो भक्त और भगवान का मिलन उनके अद्भुत प्रेम तथा समर्पण के कारण सृष्टिपर्यंत अविस्मरणीय हो गया है। आज भी लोग उसको याद करते है। फिर वो हुआ जो कल्पनातीत था, अयोध्यापति श्रीराम एक भीलनी के झूठे बैर खाते है। यहां एक बात गौर करने योग्य है, श्रीराम उस समय जटायु का दाहसंस्कार करके आते है तथा उसे पितातुल्य पद देते है जबकि वो गिद्ध था।

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला॥
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी॥

फिर भीलनी के हाथ से उसके झूठे बैर खाते है तथा उसे भी नवधा भक्ति का उपदेश देकर परमगति प्रदान करते है।

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥

मतलब वो गति शबरी को प्राप्त हुई जो महातपस्वी भी सोच नही सकते।

मतलब उस समय के सम्राट जो धरती का भार दूर करने के लिए तपस्वी वेश धारण करके वनवासी हो गए थे उन्होंने कभी भी किसी प्राणी में भेदभाव नही किया। हर व्यक्ति को कर्मानुसार उसका यथेष्ट प्रदान किया। अतः अगर हम आज जातिगत भेदभाव रखते है तो यह बात प्रभु श्रीराम की अवज्ञा ही कहलाएगी।

कल कुम्भ स्नान के उपरांत हमारे प्रधानमंत्री ने भी निम्नवर्गीय समझे जाने वाले समाज के व्यक्तियों का ऋण स्वीकार करते हुए उनके चरण धोए थे जिसकी चहुँ ओर प्रशंसा हो रही है। हमे उनसे भी सीख लेनी चाहिए। परन्तु चुनावपूर्ती ही नही बल्कि सदैव के लिए। हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। आज भक्तशिरोमणि शबरी की जन्मजयंती पर हम समरस समाज का प्रण ले भेदभाव त्याग दे, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धा होगी।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय