(लघुकथा) होली और पश्चाताप


(लेखिका-डॉ.नीलम खरे / ईएमएस)

पचास वर्ष की अधेड़ावस्था को लिए मैं सड़क पार कर रही थी कि तभी देखा कि दो किशोर लड़के सड़क पर झगड़ रहे हैं ।वे एक- दूसरे के लिए कटु शब्द बोल रहे थे ।पहला दूसरे को मोटू कह रहा था ,तो दूसरा पहले को कलूटा कह रहा था ।यह सुनकर मैं पैंतीस वर्ष पहले के ज़माने में पहुंच गई ,जब मैं स्कूल की छात्रा हुआ करती थी,और निशा मेरी बहुत पक्की सहेली थी।
“यार,निशा इस बार हम होली पर ख़ूब एन्जॉय करेंगे ।”
“बिलकुल,मीना ”
“हम ख़ूब रंग खेलेंगे ”
“कन्फर्म”
देखते-देखते,सहेलियों का सारा ग्रुप इकट्ठा हो गया ।सबने ख़ूब धमाल किया ।तभी मैं मस्ती के मूड में आ गई ,और कह उठी -” सहेलियो,हमसे बहुत बड़ी मूर्खता हो गई है जो कि हमने निशा को रंग लगाया ।”
“क्या,मतलब ?” कई स्वर गूंजे ।
“मतलब कि हमने जो भी रंग निशा पर लगाया है,वह बेकार चला गया न ?”
“मतलब?”
“मतलब यह कि निशा कोयले जैसी काली है,तो हमने यह सोचा ही नहीं कि क्या उस पर कोई रंग चढ़ेगा भी ? उस पर कोई भी रंग चढ़ने से तो रहा ?”
इस पर भारी ठहाका लगा,पर निशा अपने को अपमानित महसूस करके एकदम ख़ामोश हो गई ।उसके बाद वह कुछ भी नहीं बोली ।मैं समझ गई कि मैंने मजाक-मजाक में ही उसका दिल दुखा दिया है ।मैंने उसे बहुत मनाने की कोशिश की,पर वह इस तरह गुस्सा हुई कि फिर उसने मुझसे कोई बात ही नहीं की ।कुछ दिन बाद वह ट्रांसफर होकर दूसरे शहर चली गई ।
यह वाकया याद आने पर आज भी मेरी आंखों में पश्चाताप के आंसू आ जाते हैं ।मुझे बहुत पीड़ा होती है,जो कि मैंने अपनी नासमझी से अपनी एक पक्की सहेली को हमेशा के लिए खो दिया। आज भी सहेली को खोने का दर्द नासूर बनकर मुझे सालता रहता है ,और होली पर तो यह घाव पूरी तरह से हरा हो जाता है ।