जानिये स्कूलों में सैक्स शिक्षा के खिलाफ एक जैनाचार्य के संघर्ष की सफल दास्तान


सैक्स शिक्षा के खिलाफ 3 वर्षों तक अकेले लड़ाई लड़ी और जीती : संत रत्नसुंदर
इन्दौर की तत्कालीन सांसद सुमित्रा ताई ने संसद में आवाज उठाई और बंगला भी दिया

इन्दौर (ईएमएस)। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि वर्ष 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में देश के स्कूलों में बच्चों को सैक्स की शिक्षा देने का प्रस्ताव तैयार कर लिया गया था, लेकिन इसे रोकने के लिए जैनाचार्य रत्नसुंदर सूरीश्वर ने पूरे तीन वर्षों तक दिल्ली में रहकर खूब लड़ाई लड़ी और अंततः उनके प्रयासों से ही देश को एक बड़े षडयंत्र का शिकार होने से बचा लिया गया। जैनाचार्य रत्नसुंदर इन दिनों इन्दौर आए हुए हैं और उनका चातुर्मास भी यहीं होगा।

पत्रकारों से अनौपचारिक चर्चा के दौरान जैनाचार्य ने अपनी इस कानूनी लड़ाई का विस्तार से विवरण दिया और बताया कि वर्ष 2006 में यूनिसेफ की एक अमरीकी योजना के तहत सीबीएसई बोर्ड ने देश के स्कूलों में 15 करोड़ बच्चों को केजी वन से आगे की कक्षाओं में सैक्स एज्यूकेशन देने का प्रस्ताव तैयार कर लिया था। जब इसकी भनक उन्हें लगी तो वे तत्कालीन यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह और इंदौर की सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन सहित पक्ष-विपक्ष के अनेक नेताओं से मिले और अपना पक्ष रखा। सीबीएसई बोर्ड के चेयरपर्सन बाला सुब्रहमण्यम से भी मिले। सुमित्रा महाजन ने तो इस मुद्दे को बहुत ताकत से संसद में भी उठाया और अपने सरकारी निवास को भी इस अभियान के लिए उपलब्ध कराया। अंततः राज्य सभा की पीटिशन कमेटी के समक्ष बहस के बाद कमेटी के अध्यक्ष वैंकेया नायडू ने 2008 में एक पंक्ति का निर्णय सुनाया – ‘सैक्स एज्यूकेशन की इस देश में कोई जरूरत नहीं है।’ इस तरह एक लंबी लड़ाई अकेले जैनाचार्य ने लड़ी और उनके कारण देश के 15 करोड़ बच्चे तथा 30 करोड़ से अधिक माता-पिता और परिजन सैक्स एज्यूकेशन के अभिशाप से मुक्ति पा सके। असल में अमेरिका चाहता था कि एड्स और अन्य बीमारियों के बढ़ने से उसकी दवाईयों को भी यहां बाजार मिले।

जैनाचार्य ने आज प्रश्नों के उत्तर में कहा कि उनके संपर्क में देश के डेढ़ लाख युवा हैं। हम उनसे तो अपेक्षा करते हैं कि वे समाज को क्या दे रहे हैं लेकिन यह नहीं सोचते कि समाज उन्हें क्या दे रहा है। मीडिया को लेकर भी आचार्यश्री ने अपनी पीड़ा व्यक्त की और कहा कि पहले समाज में जो होता था, वह मीडिया में आता था लेकिन अब मीडिया में जो आता है वह समाज में होने लगा है। असल में टीआरपी के खेल ने मीडिया को भी कहीं न कहीं प्रभावित किया है। उनकी पुस्तकों में से एक ‘पवन तू अपनी दिशा बदल दे’ मीडिया की भूमिका पर ही आधारित है। गटर का ढक्कन मत खोलो पर इत्र की शीशी का ढक्कन तो खुला रखा जा सकता है – इस लक्ष्य से पत्रकारिता हो तो समाज को भी उसका लाभ मिलेगा। जैनाचार्य ने 340 पुस्तकें अब तक लिखी है और उनकी अनेक पुस्तकों के संस्करण अनेक भाषाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। अब वे इन्दौर में गुमाश्ता नगर, कालानी नगर, महेश नगर, पीपली बाजार, स्नेहलतागंज, वल्लभ नगर, पाश्र्वनाथ सोसायटी, क्लर्क कालोनी, सुखलिया, विजय नगर, अनुराग नगर, तिलक नगर, जानकी नगर, सिंधी कालोनी, कंचनबाग, बिचैली हप्सी तथा 11 जुलाई से चातुर्मास के लिए रेसकोर्स रोड़ पहुंचकर दैनिक जीवन से जुड़े विषयों पर प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे तक प्रवचन करेंगे।