बॉलीवुड की पहली पसंद बनी ऊटी. नैसर्गिक सौंदर्य के मोहपाश में बांध लेगा यह पर्यटन स्थल


हर तरफ नैसर्गिक सौंदर्य का जादू बिखरा पड़ा है। खूबसूरती आपको मंत्रमुग्ध किए बिना नहीं रह सकती।
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मुंबई। हर तरफ नैसर्गिक सौंदर्य का जादू बिखरा पड़ा है। खूबसूरती आपको मंत्रमुग्ध किए बिना नहीं रह सकती। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने इसे ‘हिल स्टेशन की रानी’ के खिताब से नवाजा था। इस जगह की रूहानी खूबसूरती का एहसास तो तभी से शुरू हो जाता है, जब हम कोयंबटूर शहर की हलचल को पीछे छोड़ते हुए नीलगिरि पहाड़ियों की ओर आगे बढ़ते हैं। यहां की बेहतरीन सड़कें और उन सड़कों के किनारे-किनारे दूर तक कतारबद्ध नारियल के पेड़ ऐसे दिखाई देते हैं, जैसे किसी चित्रकार की कल्पना साकार हो गई हो।

ऊटी जाने के दो रास्ते हैं। एक, कुन्नूर-मेत्तुपलायम रोड होकर और दूसरा, कोटगिरि-मेत्तुपलायम रोड होकर। कोटगिरि से जाने पर आपको खूबसूरत चाय बागान और पहाड़ी गांव देखने को मिलते हैं। वहीं कुन्नूर होकर जाने पर नीलगिरि माउंटेन रेलवे के दर्शन होते हैं। इस रास्ते पर टॉय ट्रेन जंगल में लुका-छिपी करते हुए कभी अचंभित करती सामने आ जाती है तो कभी हरे-भरे जंगल में चुपके से गुम हो जाती है।
उदगमंडलम ऊटी का पूरा नाम है- उदगमंडलम। यह नाम तमिल भाषा के शब्द ‘ओत्ताककाल्मंडू’ से निकला है। इसका अर्थ होता है-पहाड़ पर बसा गांव। चूंकि यह ऊंचे पहाड़ों की हसीन वादियों में बसा है, इसलिए इसे यह नाम मिला। नए साल के स्वागत की तैयारी और छुट्टियों के समय में हिल स्टेशन की रानी यानी ‘ऊटी’ की यात्रा एक जादुई एहसास की तरह है। बॉलीवुड की पहली पसंद बने तमिलनाडु का यह हिल स्टेशन चाय और चॉकलेट के लिए भी खूब मशहूर है।

जॉन सुलिवन की खोज

सन् 1817 में कोयंबटूर के तत्कालीन कलेक्टर सर जॉन सुलिवन ने ऊटी की खोज की थी। सर जॉन को यह जगह और इसकी हसीन वादियां इतनी पसंद आईं कि उन्होंने यहां के दुर्गम पहाड़ी रास्तों को सड़क की शक्ल देने का फैसला किया। साल 1819 में उन्होंने कोयंबटूर रेवेन्यू बोर्ड से मात्र 1100 रुपये की रकम लेकर सिरूमुगाई से कोटगिरि तक सड़क बनवाने का काम शुरू कराया। यह सड़क अगले दो वर्षों में बनकर तैयार हो गई। साल 1938 तक यही एकमात्र सड़क थी, जो कोयंबटूर को नीलगिरि की मनोरम पहाड़ियों से जोड़ती थी।

उसके बाद तत्कालीन गवर्नर एस.आर. लुशिंगटन ने कुन्नूर घाट रोड बनवाई। कहते हैं, जब ब्रिटिश लोगों ने इस जगह को ढूंढ़ा तो यहां डोडा जनजाति का एकछत्र राज था। नीलगिरि पहाड़ियों पर बिखरा प्रकृति का अनुपम सौंदर्य बेहद प्रभावशाली था। दरअसल, घने जंगल, सिल्वर ओक के पेड़ और चाय के बागान इस जगह को एक अलग पहचान देते हैं। मैसूर और चेन्नई के लंबे रास्ते के बीच पड़ने वाला ऊटी कभी जंगल के बीचोबीच स्थित अनजाना स्थान था। सर जॉन सुलिवन की इस खोज को ब्रिटिश अधिकारियों ने एक वरदान के रूप में लिया और ऊटी को मद्रास प्रेसीडेंसी की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया।

विंटेज यात्रा का लुत्फ

नीलगिरि माउंटेन रेलवे साल 1899 में 25 लाख रुपये की लागत से बनकर तैयार हुई थी। अगर आपके पास समय है तो आपको मेत्तुपलायम से ऊटी तक का सफर इस ट्रेन से करना चाहिए। यह ट्रेन दिन में दो बार चलती है। पहली ट्रेन सुबह सात बजे चलकर दस बजे ऊटी पहुंचती है, वहीं दूसरी ट्रेन दोपहर 12 बजे ऊटी से चल कर मेत्तुपलायम पहुंचती है। ऊटी से कुन्नूर तक यह ट्रेन डीजल इंजन से चलती है, फिर इसमें भाप का इंजन लगाया जाता है।
उल्लेखनीय है कि इसकी वजह से साल 2005 में यूनेस्को ने नीलगिरि रेलवेज को विश्व धरोहर के खिताब से नवाजा। तकरीबन 46 किलोमीटर की इस यात्रा में आपको मिलेंगे 208 मोड़, 16 सुरंग और 250 पुल। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इस यात्रा की विंटेज वैल्यू बरकरार रखने के लिए आज भी इसके टिकट मैनुअल स्टाइल में काटे जाते हैं। इस यात्रा में ट्रेन हिल्लिग्रोव स्टेशन पर 10 मिनट के टी ब्रेक के लिए रुकती है। अगर आपके पास समय कम है तो आप ऊटी से कुन्नूर तक की शॉर्ट राइड लेकर भी इस विंटेज यात्रा के अनुभव का लुत्फ उठा सकते हैं। छुकछुक चलती यह रेलगाड़ी कितने ही पुल पार करती हुई धीरे-धीरे ऊटी पहुंचती है। इस रेल को एशिया की सबसे धीमी गति से चलने वाली रेल के रूप में भी जाना जाता है।

दर्शनीय है ऊटी लेक

ऊटी में सबसे ज्यादा मशहूर पिकनिक स्पॉट है ऊटी लेक। यह 65 एकड़ में फैली हुई है। ऊटी लेक को देखकर आपको यकीन नहीं होगा कि यह एक कृत्रिम लेक है। इस लेक का निर्माण जॉन सुलिवन ने वर्ष 1824 में कराया था। इस लेक को पानी से भरने का काम खुद नीलगिरि की पहाड़ियां करती हैं। इसके पास खूबसूरत उद्यान विकसित किए गए हैं, जहां बच्चों के साथ बड़े भी खूब एंजॉय करते हैं।

कभी देखा है धागों से तैयार फूल

ऊटी लेक के बिल्कुल सामने है थ्रेड गार्डेन। यह एक प्राइवेट म्यूजियम है, जो दुनिया का पहला थ्रेड गार्डेन है। इस गार्डन की स्थापना केरल के एक प्रोफेसर एंटनी जोसेफ ने की थी। इसे तैयार करने में एंटनी जोसेफ और उनकी टीम को पूरे 12 साल का समय लगा। यहां धागे से बने फूलों की प्रदर्शनी लगी हुई है। इस म्यूजियम के संचालक का दावा है कि गवर्नमेंट बोटेनिकल गार्डन में जितने भी प्रकार की प्रजातियों के फूल पाए जाते हैं, उन सभी के नमूने यहां थ्रेड से तैयार किए गए हैं। इन फूलों को बनाने में एक करोड़ मीटर धागों का प्रयोग किया गया है।

सेंट स्टीवन चर्च

ऊटी शहर में हरे-भरे पहाड़ों के बीच एक सोने- सी दमकती हुई इमारत नजर आती है। यह इमारत सेंट स्टीवन चर्च है। मद्रास के गवर्नर स्टीवन रमबोल्ड लुशिंगटन ने 23 अप्रैल, 1829 को इस चर्च की नींव रखी थी। इसके आर्किटेक्ट थे कैप्टन जॉन जेम्स अंडरवुड। कहते हैं इस चर्च में जिस लकड़ी का प्रयोग हुआ है, वह टीपू सुल्तान के पैलेस से ली गई थी। इस चर्च के भीतर खूबसूरत ग्लास पेंटिंग्स बनी हुई हैं, जिसमें जीसस के लास्ट सपर की पेंटिंग बहुत शानदार है।

शान है बोटेनिकल गार्डन

ऊटी की एक और शान है गवर्नमेंट बोटेनिकल गार्डन। यह गार्डन 55 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। वर्ष 1848 में इसे बनाया गया। इसके आर्किटेक्ट थे सर विलियम ग्राहम मैकाइवर। दरअसल, उस समय इसे ब्रिटिश अफसरों की फूल और सब्जी की जरूरतों को पूरा करने के लिए शुरू किया गया था, लेकिन बाद में इसे एक बड़ा और प्रतिष्ठित सार्वजनिक गार्डन बना दिया गया। वर्तमान में इसे 6 खंडों में बांटा गया है। वैसे तो यह पूरा का पूरा गार्डन देखने लायक है, लेकिन इसके बीचोबीच एक दुर्लभ फॉसिल ट्री ट्रंक मौजूद है। माना जाता है कि यह 2 करोड़ साल पुराना है। अब इस पेड़ का तना एक कठोर चट्टान की तरह बन चुका है। यहां भारत का एक नक्शा भी बना हुआ है, जिसके आगे सैलानी तस्वीरें खिंचवाना पसंद करते हैं।

डोडाबेटा पीक पर ऑब्जर्वेटरी

डोडाबेटा पीक समुद्र तल से 2623 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। बडगा भाषा में डोडाबेटा का मतलब होता है बड़ा पर्वत। ऊटी शहर से मात्र 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह स्थान आपको खूबसूरत नीलगिरि पहाड़ियों का दर्शन कराता है। डोडाबेटा ईस्टर्न घाट की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है। यहां तक पहुंचने का रास्ता जंगल से होकर जाता है। खूबसूरत जंगल से होकर जब आप डोडाबेटा पहुंचते हैं तो यहां का नजारा देखने लायक होता है। इतनी ऊंचाई पर कभी-कभी बादल के टुकड़े भी नीचे झुक आते हैं। यहां ऊपर एक ऑब्जर्वेटरी भी बनी हुई है, जहां से पूरी वादी का नजारा देखने को मिलता है।

टी फैक्ट्री में लें चाय की चुस्की

डोडाबेटा से वापसी पर आप यहां की बेंचमार्क टी फैक्ट्री देखने जरूर जाएं। इस टी फैक्ट्री में आपको चाय बनाने की पूरी प्रक्रिया से रूबरू होने का मौका मिलता है। बागानों से तोड़कर लाई गई चाय की हरी पत्तियों का आपके प्याले तक पहुंचने का यह सफर कई खूबसूरत मोड़ से होकर गुजरता है। इस टी फैक्ट्री में यहां बनने वाली सभी तरह की चाय का स्वाद भी चखाया जाता है। यहां एक दिन में लगभग पांच हजार प्याली चाय सैलानियों को चखाई जाती है।

वैक्स प्लैनेट में मिलिए नामी हस्तियों से

ऊटी रेलवे स्टेशन से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है यह एक छोटा, मगर खूबसूरत म्यूजियम, जिसमें वैक्स के पुतलों द्वारा कई बड़ी हस्तियों को संजोया गया है। इसमें महात्मा गांधी से लेकर बराक ओबामा और मर्लिन मुनरो से लेकर लेडी डायना तक मौजूद हैं। इस म्यूजियम की खासियत यह है कि यहां केवल बड़ी हस्तियों के पुतले भर नहीं हैं, बल्कि उनके जीवन का एक हिस्सा भी मौजूद है। जैसे अमिताभ बच्चन के शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ यानी केबीसी का पूरा का पूरा सेट या फिर मदर टेरेसा की प्रेयर करती हुई मूर्ति। यह जगह बड़ों को ही नहीं, बच्चों को भी खूब लुभाती है।

शूटिंग पॉइंट का आकर्षण

ऊटी को बॉलीवुड की पहली पसंद माना जाता है। यहां जाएं तो शूटिंग पॉइंट्स जाना न भूलें। मजेदार बात यह है कि यह जगह आपको देखी-देखी सी लगेगी, क्योंकि आपने अनेक फिल्मों में इसे देखा होगा। इस जगह पर शाम को जाएं, बिल्कुल सूर्यास्त से पहले। उस समय शूटिंग पॉइंट की खूबसूरती आपको और बांध लेगी।

मिल्टन अबॉर्ट एस्टेट

ऊटी के प्राकृतिक आकर्षणों में एक विशेष आकर्षण है औपनिवेशिक जमाने का चार्म, जो यहां हर चीज में झलकता है। फिर चाहे वह यहां का आर्किटेक्चर हो या फिर बोटेनिकल गार्डन। अगर आप भी ऊटी के उस कोलोनियल एरा को महसूस करना चाहते हैं तो कोशिश करें कि किसी एस्टेट में रुकें। यहां ऐसी कई एस्टेट मौजूद हैं, जिन्हें ब्रिटिश अधिकारियों ने बसाया था। ऐसी ही एक एस्टेट है मिल्टन अबॉर्ट स्टेट, जो पांच एकड़ में फैली है। घने जंगल के बीच एक खूबसूरत कोलोनियल बंगला बनाया गया। 18वीं सदी का यह कोलोनियल बंगला आज भी अपनी उसी शान के साथ खड़ा हुआ है। यहां आकर लगता है कि जैसे वक्त ठहर-सा गया है।

टी प्लांटेशन में छुट्टियां

जहां तक नजर जाए, दूर-दूर तक सिर्फ चाय के बागान हों। किसी अलबेले मतवाले पंछी की कूक से आपकी आंखें खुलें और सनसेट के रंगों पर रात का नीला आकाश दुशाला ओढ़ा दे। कभी भी बरस जाएं बदरा और इस मनोरम दृश्य के बीच हो आपका हॉलिडे होम। एक ऐसा हॉलिडे, जो हमेशा-हमेशा के लिए यादों में बस जाए। यही सोच कर तो लोग नीलगिरि पहाड़ियों की ओर खिंचे चले आते हैं। अगर आप नीलगिरि पहाड़ियों का हुस्न नजदीक से देखना चाहते हैं तो अपनी छुट्टियां टी प्लांटेशन में गुजारें। कुन्नूर और कोटगिरि में आपको ऐसे कई खूबसूरत रिजॉट्र्स या गेस्ट हाउस मिल जाएंगे। ऊटी सैलानियों से हमेशा भरा रहता है, जबकि कुन्नूर इसके पास एक शांत और छोटा पहाड़ी कस्बा है।

बेहतरीन बेकरी और कन्फेक्शनरी स्टोर

ऊटी अंग्रेजों की खोज है, इसलिए यहां आज भी आपको कई बेहतरीन बेकरी और कन्फेक्शनरी स्टोर मिल जाएंगे। अगर आप मीठा पसंद करते हैं तो किंग स्टार कन्फेक्शनरी पर जरूर जाएं। किंग स्टार वर्ष 1942 से चॉकलेट बना रहे हैं। इनके बनाए चॉकलेट दूर-दूर तक मशहूर हैं। यहां के मार्शमेलो, सिनेमन पाई और कुकीज आपका दिल जीत लेंगे। अगर आप वेजिटेरियन हैं तो आपको शुद्ध तमिल खाना बड़े आराम से मिल जाएगा। यहां रेलवे स्टेशन के पास कई छोटे-छोटे भोजनालय हैं, जो केले के पत्तों पर पारंपरिक दक्षिण भारतीय भोजन परोसते हैं। यदि आप बिरयानी के शौकीन हैं तो आप यहां के हैदराबाद बिरयानी हाउस की बिरयानी जरूर ट्राई करें। इनके आउटलेट पूरे शहर में बने हुए हैं। ठंड के मौसम में यहां का बारबेक्यू सैलानियों को बहुत पसंद आता है। यहां आपको भारतीय मांसाहारी पकवानों के अलावा लेबनीज, मोरक्कन और मिडिल ईस्ट फूड्स भी खाने को मिलेंगे। अगर आप इटैलियन फूड पसंद करते हैं तो क्लब रोड स्थित प्लेस टु बी रेस्टोरेंट कैफे में जरूर जाएं। यहां फायरवुड पर पका पिला आपको बहुत पसंद आएगा।

चॉकलेट और चाय की शॉपिंग

यहां एडम्स फाउंटेन के आसपास फैला हुआ है ऊटी का छोटा मगर भरा-पूरा बाजार, जहां रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर सैलानियों की फरमाइशों तक का लगभग हर सामान उपलब्ध हो जाता है। इस बाजार में खाने-पीने के कई ठिकाने मौजूद हैं। यहां से ब्रांडेड कपड़े, जूते और खूब सारी चॉकलेट और चाय खरीद सकते हैं।

– ईएमएस