सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है: बिस्मिल जयंती


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सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल मे है,
देखना है जोर कितना बाजु ए कातिल में है।

आजादी के आंदोलन के समय यह नारा बहुत प्रचलित हुआ था तथा आज भी लोग इसे बोलते सुने जा सकते है। इसके रचयिता थे पंडित रामप्रसाद बिस्मिल। आज उनकी जन्मजयंती है। बाल्यकाल से ही मुझे कविताएं पढ़ने में रुचि रही है। क्रांतिकारी कवियों में मुझे रामप्रसाद बिस्मिल तथा उनके साथी अशफाकउल्ला खान की कुछ रचनाएं बहुत प्रिय रही है। बिस्मिल मुझे खासतौर पर प्रिय थे। उनका एक एक शब्द तत्कालीन समय मे क्रांति की प्रेरणा देता था तथा आज भी सदावत्सला मातृभूमि के तरफ समर्पण की प्रेरणा देते है।

न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना,
मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पे दीवाना,
नहीं कुछ गैर-मुमकिन है जो चाहो दिल से ‘बिस्मिल’ तुम,
उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना।

क्रांतिकारियों की प्रेरणास्वरूप उनकी कविताएं तथा उनका जज्बा आज भी अविस्मरणीय है। मात्र 30 वर्ष की आयु में वीरगति को प्राप्त हुए बिस्मिल का जन्म जेष्ठ शुक्ला एकादशी तदनुसार 11 जून 1897 को शाहजहांपुर में हुआ था।

उन्होंने सन 1916 में 19 वर्ष की आयु में क्रान्तिकारी मार्ग में कदम रखा था। 11 वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं और स्वयं ही उन्हें प्रकाशित किया। उन पुस्तकों को बेचकर जो पैसा मिला उससे उन्होंने हथियार खरीदे और उन हथियारों का उपयोग ब्रिटिश राज का विरोध करने के लिये किया। 11 पुस्तकें उनके जीवन काल में प्रकाशित हुईं, जिनमें से अधिकतर सरकार द्वारा ज़ब्त कर ली गयीं।
इतिहास में एक घटना आज भी अंकित है। काकोरी रेलवे स्टेशन पर बिस्मिल के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश खजाने को लूटा था। बिस्मिल के साथ काकोरी कांड में अशफाकउल्ला खाँ, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद, शचीन्द्रनाथ बख्शी, मन्मथनाथ गुप्त, मुकुन्दी लाल, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल गुप्त तथा बनवारी लाल शामिल थे। 8 डाउन सहारनपुर लखनऊ पैसेंजर रेलगाड़ी को काकोरी स्टेशन से आगे चैन पुलिंग करके रोक दिया गया। गार्ड के डिब्बे से सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया गया। चाँदी के सिक्कों व नोटों को चादरों में बाँधकर वहाँ से भागने में एक चादर वहीं छूट गयी। चादर में लगे धोबी के निशान से इस बात का पता चल गया कि चादर शाहजहाँपुर के ही किसी व्यक्ति की है। शाहजहाँपुर के धोबियों से पूछने पर मालूम हुआ कि चादर बनारसी लाल की है। बनारसी लाल से मिलकर पुलिस ने सारा भेद प्राप्त कर लिया।

पुलिस ने बिस्मिल तथा उनके पांच साथियों को गिरफ्तार कर लिया। मुकदमा चला तथा उन्हें पांच वर्ष की कैद से लेकर मृत्युदंड तक की सजा कोर्ट ने सुनाई। बिस्मिल को सोमवार 19 दिसम्बर 1927 तदनुसार पौष कृष्ण एकादशी को गोरखपुर की जिला जेल में फाँसी दे दी गयी। निर्जला एकादशी के दिन प्रारम्भ हुई उनकी जीवन यात्रा सफला एकादशी के दिन पूर्ण हो गई।

बिस्मिल मातृभूमि के लिए दिए गए अपने बलिदान तथा अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के लिए युगों युगों तक याद किये जायेंगे।

कभी ओ बेख़बर तहरीके़ आज़ादी भी रुकती है?
बढ़ा करती है उसकी तेज़ी-ए-रफ़्तार फांसी से।
यहां तक सरफ़रोशाने वतन बढ़ जाएंगे क़ातिल,
कि लटकाने पड़ेंगे नित मुझे दो चार फांसी से।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय