वरिष्ठता क्रम की अनदेखी कांग्रेस को दे रही नुकसान


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हमारे देश की सबसे बड़ी पार्टी अभी अपने अस्तित्व के संकट से झुझ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में 44 सीट पर सिमट चुकी पार्टी में राहुल गांधी ने नई जान फूंकने के लिए कमान सम्भाली थी। साल 2017 के दिसम्बर महीने में राहुल गांधी ने कांग्रेस की अध्यक्षता ग्रहण की थी। राहुल को 2009 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिली बड़ी राजनैतिक जीत का श्रेय दिया गया था। लेकिन 2014 तथा बाद के चुनावों में उनका प्रदर्शन अच्छा नही रहा। 2014 के चुनावों की शिकस्त भी लोग राहुल के ऊपर ही मढ़ते रहे है।

लेकिन कांग्रेस जो कि गांधी परिवार तक ही सिमट कर रह गई है, वहां गांधी टाइटल के अलावा और कौन चले? इसीलिए शिकस्त दर शिकस्त होने के बावजूद भी कमान माँ बेटे के पास ही रही।

इन लोकसभा चुनावों से पार्टी को काफी अपेक्षाएं थी। उसका एक कारण तीन राज्यो में सत्ता प्राप्त करना भी था। लोग इसे सत्ता का सेमीफाइनल मान रहे थे। लेकिन सत्ता का सेमीफाइनल कुछ अंतर से जीतने वाली पार्टी फाइनल बड़े अंतर से हार गई। यहां तक कि सम्भावित हार से आशंकित होकर राहुल गांधी भी दो जगहों से चुनाव लड़े थे। संभावना के अनुसार उन्होंने परम्परागत अमेठी सीट पर अपनी हार दर्ज करवाई, जो कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है।

इस लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं। राहुल ने कल शाम पार्टी नेताओं की बैठक बुलाई थी। बताया जा रहा है कि राहुल ने पार्टी को सुझाव दिया है कि अध्यक्ष पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार का चयन करें, तब तक वे इस पद का जिम्मा संभालेंगे। राहुल यह दो तीन दिनों से कह रहे है। लेकिन कांग्रेस के नेता लगता है कि गांधी परिवार के आवरण से बाहर नही आना चाहते। तभी तो पूर्व वित्तमंत्री पी चिदम्बरम राहुल को मनाने के लिए रोने लगते है। आखिर क्या कारण है? क्या कांग्रेस के पास योग्य नेताओ का अभाव है?

इससे पहले लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेते हुए पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़, झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार और असम कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा ने सोमावर को इस्तीफा दे दिया। अब तक विभिन्न प्रदेशों के 13 वरिष्ठ नेता राहुल गांधी को इस्तीफा भेज चुके हैं। माना यह जा रहा है कि राहुल अपना फैसला बदल लें और पार्टी का पुनर्गठन कर सकें इसलिए पार्टी के कई राज्य प्रमुखों ने या तो इस्तीफा दे दिया, या फिर इसकी पेशकश की है।

राहुल ने शनिवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कहा था कि गहलोत, कमलनाथ और चिदंबरम जैसे नेताओं ने बेटों- रिश्तेदारों को टिकट दिलाने की जिद की और उन्हीं को चुनाव जिताने में लगे रहे। राहुल ने कहा था कि पुत्र मोह के चलते नेताओं ने पार्टी हित को दरकिनार कर दिया। हालांकि यह कहते हुए वो यह भूल गए कि सोनियाजी को भी पुत्र मोह था तभी तो आपको दसियों वरिष्ठ नेताओं के बावजूद बिना किसी वरीयता के आपको अध्यक्ष बनाया गया था।

मुझे कहना तो नही चाहिए पर सत्य यही है कि वरिष्ठ नेताओं के रहते हुए कांग्रेस की कमान राहुल गांधी को सौंपना आत्मघाती निर्णय था। अगर अभी भी इसे नही सुधारा गया तो यह पार्टी के लिए ही नही देश के लिए भी खराब रहेगा। क्योकि पक्ष तथा विपक्ष में दो मजबूत राष्ट्रीय पार्टियां अगर नही हो तो देश की व्यवस्था सुचारू नही चल सकती।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय।