ऐसी भक्ति करे रैदासा


सुप्रभात ः ललित शर्मा

आज माघ शुक्ला पूर्णिमा है। आज संगम पर रहने वाले श्रद्धालुओं का कल्पवास पूरा होगा। एक धार्मिक मान्यता के अनुसार माघ महीने में भगवान विष्णु गंगा में निवास करते है। इसलिए ही हिन्दू श्रद्धालु इस सम्पूर्ण महीने गंगा के किनारे कल्पवास करते है। मान्यता है कि माघी पूर्णिमा पर देवता भी रूप बदलकर गंगा स्नान के लिए प्रयाग आते हैं। इसलिए इस तिथि का विशेष महत्व धर्म ग्रंथों में बताया गया है।

आज के दिन ही सन्त रविदास जी का जन्म हुआ था। इस वर्ष उनका 642 वां जन्मदिवस मनाया जा रहा है। संत रविदास जी का जन्म वाराणसी के पास के गांव में हुआ था। माना जाता है इनका जन्म लगभग सन 1450 में हुआ था। उनकी माता का नाम श्रीमति कलसा देवी और पिता का नाम श्रीसंतोख दास जी था। संत रविदास जी ने हमेशा लोगों को बिना भेदभाव के आपस में प्रेम करने की शिक्षा दी।

एक कथा के अनुसार रविदास जी अपने साथी के साथ खेल रहे थे। एक दिन खेलने के बाद अगले दिन वो साथी नहीं आता है तो रविदास जी उसे ढूंढऩे चले जाते हैं, लेकिन उन्हे पता चलता है कि उसकी मृत्यु हो गई। ये देखकर रविदास जी बहुत दुखी हो जाते हैं, लेकिन वो अपने मित्र को बोलते हैं कि उठो ये समय सोने का नहीं है, मेरे साथ खेलो। इतना सुनकर उनका मृत साथी खड़ा हो जाता है।

यह तो उनके चमत्कार की कथा थी। लेकिन जिसके कारण यहां उन्हें याद किया जा रहा है वो उनका चमत्कार नही उनके द्वारा किये गए सामाजिक समरसता के कार्य है। जन्म से चमार कुल में उत्पन्न रैदास विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। भक्तिमति मीरा बाई उनकी शिष्या थी। जबकि वो उच्चकुलीन थी।

मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा जैसे दिखावों में रैदास का बिल्कुल भी विश्वास न था। वह व्यक्ति की आंतरिक भावनाओं और आपसी भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। रैदास ने अपनी काव्य-रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है, जिसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और उर्दू-फ़ारसी के शब्दों का भी मिश्रण है। रैदास को उपमा और रूपक अलंकार विशेष प्रिय रहे हैं। सीधे-सादे पदों में संत कवि ने हृदय के भाव बड़ी सफ़ाई से प्रकट किए हैं। इनका आत्मनिवेदन, दैन्य भाव और सहज भक्ति पाठक के हृदय को उद्वेलित करते हैं। रैदास के चालीस पद सिखों के पवित्र धर्मग्रंथ ‘गुरुग्रंथ साहब’ में भी सम्मिलित हैं।

अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में सन्त रैदास का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी रचनाओं की विशेषता लोक-वाणी का अद्भुत प्रयोग रही है जिससे जनमानस पर इनका अमिट प्रभाव पड़ता है। मधुर एवं सहज संत शिरोमणि रैदास की वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है।

रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे।

उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोले, गंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।

ऐसी कई कथाएं उनके बारे में सुनी जाती है, लेकिन वर्तमान में सन्त रैदास के विचारों की परम आवश्यकता है। आजादी के बाद भी हमारा समाज जातिगत रूप से विभक्त है। जिसके अंदर समरसता की निनान्त आवश्यकता है। समरस समाज ही समृद्ध समाज की ओर अग्रसर होता है। हमारा देश समृद्ध हो सशक्त हो इसके लिए हमे रैदास जैसे सन्तो की वाणी का अनुसरण करना ही चाहिए।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय