नींद की दुश्मन है नीली रोशनी


नई दिल्ली। यदि आपको रात को जीरो वाट के नीले बल्ब या एईडी के प्रकाश में सोने की आदत है तो इसे फौरन बदल दीजिये। टोरंटो विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने शोध में पाया है कि नीली लाइट नींद की राह का बड़ा रोड़ा है। यह नींद लाने वाले हार्मोन मेलाटोनिन को बनने से रोकती है। वैसे सभी प्रकार की कृत्रिम रोशनी इस हार्मोन पर प्रतिवूâल प्रभाव डालती है लेकिन नीली रोशनी का असर सबसे अधिक होता है। मानव शरीर में मौजूद कुदरती घड़ी (बायोलोजिक क्लॉक) प्रकाश और अंधेरे के अनुपात पर वेंâद्रित होती है जिसे कार्वेâडियन रिद्म का नाम दिया गया है। यह सामंजस्य नींद और भोजन प्रक्रिया का निर्धारण करता है। इसके अलावा माqस्तष्क की गतिविधियों, हार्मोन उत्पादन और कोशिका पुर्निनर्माण का भी इससे सीधा संबंध रहता है। टोरंटो यूनिर्विसटी में कृत्रिम रोशनी के नींद पर प्रभाव पर गहन शोध हुआ। विज्ञानियों ने कुदरती प्रक्रिया के बारे में भी विस्तार से बताया। उनके अनुसार जब शरीर कुदरती प्रकाश के संपर्वâ में होता है तब माqस्तष्क का हाइपोथालमस क्षेत्र प्रकाश और अंधकार के आधार पर नींद का पैटर्न तय करता है। प्रकाश की पहचान रेटिना करता है जो हाइपोथालमस को सिग्नल भेजता है। नेशनल स्लीप फाउंडेशन के अनुसार जब अंधेरा होना शुरू होता है तब हाइपोथालमस शरीर को नींद के हामोर्स (मेलाटोनिन आदि) बनाने तथा शरीर का तापमान कम करने के सिग्नल देता है।
कृत्रिम प्रकाश पड़ने पर प्राकृतिक रिद्म बाधित हो जाता है। शोध में बताया गया है कि कृत्रिम लाइट में प्रयोग के दौरान मेलाटोनिन बनना ८५ प्रतिशत तक कम हो गया, नीली रोशनी में सबसे अधिक कम हुआ। टयूब तथा बल्ब की रोशनी यदि नीली है तो नींद के लिए दोतरफा बाधाएं उत्पन्न होती हैं। सुझाव दिया गया है कि सोने से ३० से ६० मिनट पहले नीले बल्ब या टयूबलाइट को बंद कर दिया जाए। स्लीप टू लिव इंस्टीटयूट के निदेशक डॉ रॉबर्ट ओएक्समैन के अनुसार इस अवधि के दौरान न टीवी चलना चाहिए, न टेबलेट्स और न ही कप्यूटर या स्मार्टफोन। ऐसे में मेलाटोनिन प्राकृतिक रूप से बनने लगता है।