कोरोना की वैक्सिन तैयार करने भारतीय दवा कंपनियों ने भी कसी कमर


प्रतिकात्मक तस्वीर। (PC :catholicireland.net)

दुनिया भर में दहशत कायम करने वाले कोरोना वायरस (Covid-19) के खिलाफ वैक्सिन तैयार करने के लिये दुनिया भर की दवा कंपनियां रात-दिन एक कर रही हैं। इसी क्रम में भारतीय कंपनियां भी अपना जोर लगा रही हैं।

इस संबंध में जायडस कैडिला के चेयरमेन पंकज पटेल ने मीडिया को बताया कि वे दो तकनिकों के आधार पर कोरोना की वैक्सिन तैयार करने में जुटे हैं। इन दो तकनिकों के आधार पर तैयार दवाओं की प्रि-क्लिनिकल जांच प्राणियों पर फिलहाल चल रही है और आने वाले दो-तीन महीनों में नतीजे सामने आयेंगे। उन्हीं नतीजों के आधार पर पता चलेगा कि आगे किस तकनिक के आधार पर बढ़ा जाए।

बायोटेक्नोलोजी डिपार्टमेंट की सचिव रेनु स्वरुप ने मीडिया से कहा है कि दो-तीन कंपनियां इस कार्य में लगी हुई हैं और उनकी रिसर्च वि‌भिन्न चरणों में हैं। उधर पूना स्थित सेरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी प्राणियों में अपनी रिसर्च आजमा रही है। यह कंपनी अमेरिका की बायोटैक्नोलोजी कंपनी कोडाजेनिक्स के साथ मिलकर संशोधन कर रही है। अगले दो महीनों में एनिमल ट्रायल के बाद हयुमन ट्रायल शुरु की जायेगी, ऐसा कंपनी के सीईओ अदार पूनावाला का कहना है।

अदार पूनावाला ने कहा कि कृत्रिम रूप से विकसित वैक्सीन वायरस स्ट्रेन मूल वायरस के समान है और यह एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है। हमारे शुरुआती आंकड़ों से पता चलता है कि यह टीका लगाए गए 60 से 70% लोगों को शायद सुरक्षा प्रदान करेगा, बाकी को अभी भी यह बीमारी हो सकती है।

दवाओं के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने सरकार ने 14,000 करोड़ का पैकेज ‎दिया

ईधर भारत में बड़े स्तर पर ड्रग या दवाओं के घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने 14,000 करोड़ रुपए के पैकेज की घोषणा की है। इससे देश में सक्रिय फार्मास्युटिकल घटक (एपीआई) के उत्पादन को प्रोत्साहन मिलेगा। इस फैसले से हमारी चीन से आयात निर्भरता भी कम हो सकेगी।

कोरोनावायरस के प्रकोप से भारत में थोक दवाओं और एपीआई के आयात पर पूरी तरह रोक लग गई है। इससे यह डर पैदा हो गया है कि अगर महामारी की समयसीमा और भी लंबी खिंच गई तो देश में दवाओं की कमी हो सकती है।

कैबिनेट द्वारा लिए गए निर्णय के अनुसार, बल्क ड्रग्स और एपीआई के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए चार योजनाओं की शुरुआत की जाएगी। पहली योजना के तहत सरकार ने 1,000 करोड़ रुपये का बजट प्रदान किया है, जो राज्यों में थोक दवाओं को उपलब्ध कराने में मदद करेगा।

राज्य सरकारें ऐसे पार्को के लिए 1000 एकड़ जमीन उपलब्ध कराएंगी। इसके साथ ही बल्क ड्रग प्रोत्साहन योजना 6,940 करोड़ रुपए के कुल बजट के साथ चलाई जाएगी। यह योजना चार वर्षो की अवधि के लिए थोक दवा इकाइयों वाले निवेशकों को उत्पादन लागत पर 20 फीसदी प्रोत्साहन प्रदान करेगी। पांचवें वर्ष में प्रोत्साहन 15 फीसदी और छठे वर्ष से पांच फीसदी हो जाएगा। देश में मेडिकल डिवाइस पार्क को राज्यों के साथ मिलकर प्रोत्साहित किया जाएगा। इसके लिए राज्यों को हर पार्क के लिए अनुदान के रूप में अधिकतम 100 करोड़ रुपए दिए जाएंगे।

कंपनियों द्वारा चिकित्सा उपकरणों के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए 3,420 करोड़ रुपये का बजट भी निर्धारित किया गया है। घरेलू विनिर्माण के लिए सभी 53 एपीआई की पहचान की गई है। बल्क ड्रग पार्क की इस योजना के अंतर्गत प्राप्त वित्तीय सहायता से साझा अवसंरचना सुविधाओं का निर्माण किया जाएगा। इससे देश में उत्पादन लागत में कमी आएगी और बल्क ड्रग के लिए अन्य देशों पर निर्भरता भी कम होगी।

कोरोना की वैक्सीन बनाने के लिए यूरोप में 3200 लोगों पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू

उधर कोरोना वायरस संक्रमण की मार झेल रहे यूरोपीय देशों ने जोर-शोर से इसकी वैक्सीन तैयार करने पर काम करना शुरू कर दिया है। यूरोपीय देशों के 3200 लोगों पर रविवार से क्लिनिकल ट्रायल शुरू हुआ है, जिसमें चार प्रमुख दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है। ये वे चार दवाएं हैं, जो अब भी कोरोना के इलाज के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं।

हालांकि, यह ट्रायल उसकी वैक्सीन बनाने के लिए शुरू हुए हैं। फ्रांस की पब्लिक हेल्थ रिसर्च बॉडी ने रविवार को जानकारी दी कि जिन चार दवाओं को वैक्सीन बनाने के लिए ट्रायल में शामिल किया जा रहा है, उनमें रेमडेसिविर, लोपिनाविर, रिटोनाविर और कई कॉम्बिनेशन शामिल हैं। चौथे ट्रायल में इन दवाओं को इंटरफेरोन बीटा या हाइड्रोऑक्सीक्लोरोक्वीन के साथ या उसके बिना भी ट्रायल कर देखा जाएगा। जिन 3200 लोगों को क्लिनिकल ट्रायल के लिए चुना गया है, वे सभी कोरोना वायरस से पीड़ित हैं और बेल्जियम, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, लक्जमबर्ग, स्पेन और नीदरलैंड के रहने वाले हैं।