नज़रिया: ईरान में विरोध-प्रदर्शन के मायने क्या हैं?


ईरान में पिछले कुछ दिनों से जारी विरोध-प्रदर्शनों पर दुनिया भर की नज़र गई है. आख़िर ईरान में इन विरोध-प्रदर्शनों की ज़मीन क्या है और इसका क्या असर होगा? पूरे मामले पर बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी ने प्रोफ़ेसर मुक्तदर ख़ान से बात की. ख़ान के ही शब्दों में ही पढ़िए यह विश्लेषण-यह प्रदर्शन आर्थिक नीतियों के ख़िलाफ़ हैं. बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई है. मंहगाई भी बहुत बढ़ गई है और इन सारी चीज़ों से लोगों में बहुत नाराज़गी है.

लोगों को लगता है कि ईरान सीरिया और यमन में पैसे खर्च कर रहा है, लेकिन अपने ही घर में विकास के काम ठप पड़े हैं. लोग ईरान फ़र्स्ट का स्लोगन भी लहरा रहे हैं.अर्थव्यवस्था की समस्या से जुड़ा यह प्रदर्शन अब सत्ता परिवर्तन की मांग कर रहा है. लोग ईरान के प्रमुख धार्मिक नेता ख़मेनई का विरोध कर रहे हैं. तक़रीबन 10 से 12 शहरों में विरोध की आग फैल गई है. जिन शहरों प्रदर्शन हो रहा है वो काफ़ी धार्मिक शहर हैं.

सरकार के समर्थन में भी लोग सड़क पर उतरे हैं. हालांकि यह स्वाभाविक प्रदर्शन से ज़्यादा रणनीतिक होता है. सरकारें लोगों के विरोध-प्रदर्शन के समानांतर ऐसे प्रदर्शनों को अंजाम दिलवाती हैं.ऐसा तुर्की में भी देखने को मिला था. ऐसा करके अंतरराष्ट्रीय समुदाय को दिखाने की कोशिश की जाती है कि सरकार पर लोगों का भरोसा बना हुई है.

अभी ईरान में सरकार के समर्थन में जितने प्रदर्शन हुए हैं वो काफ़ी छोटे हैं. दिलचस्प ये है कि जब सरकार के समर्थन में लोग सड़क पर उतरे तो सरकार विरोधी विरोध-प्रदर्शन और तेज़ हो गए.हम कह सकते हैं कि ये विरोध-प्रदर्शन काफ़ी गंभीर हो चुके हैं. ईरान में इस तरह के प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है. 2008 और 2009 से इस तरह के विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे.

इन विरोध-प्रदर्शनों को देखें तो दो-तीन चीज़ें साफ़ नज़र आती हैं. ईरान पर अमरीका के अलावा किसी और का प्रतिबंध नहीं है. इस वजह से ईरान का तेल निर्यात अधिकतम पर है.तेल की क़ीमत भी 40 डॉलर प्रति बैरल से 60 डॉलर प्रति बैरल हो गई है. ऐसे में ईरानी नागरिकों को पता है कि सरकार के पैसे ख़ूब आ रहे हैं, लेकिन इन पैसों का इस्तेमाल घरेलू अर्थव्यवस्ता को दुरुस्त करने के लिए नहीं हो रहा है.

लोगों के मन में यह बात मजबूती से बैठ गई है कि उनकी सरकार देश के विकास में काम करने बजाय सीरिया, यमन और इराक़ में खर्च कर रही है.