बल्ब से वाईफाई के परीक्षण में जुटी सरकार


जहां बिजली है, वहीं पहुंच जाएगा इंटरनेट

नई दिल्ली (ईएमएस)। कल्पना कीजिए, आपको अपने घर में लगे एलईडी बल्ब से वाईफाई या ब्रॉडबैंड इंटरनेट मिले और वह भी बिना हाईस्पीड डाटा ट्रांसफर की सुविधा के, तो कितना अच्छा रहेगा। यह कल्पना भी कीजिए कि जब आप भीड़भाड़ वाले मॉल से गुजरें और एलईडी से लैस मूवी बिलबोर्ड आपके स्मार्टफोन पर हाई क्वॉलिटी प्रमोशनल वीडियो और गाने चलाने लगे तो आप कैसा महसूस करेंगे। यहां आपको किसी साइंस फिक्शन मूवी के सीन के बारे में नहीं बताया जा रहा हैं। भारत सरकार एक ऐसी तकनीक का परीक्षण कर रही है, जिससे यह सब हो सकता है। यह तकनीक आपको और भी कई फीचर्स मुहैया करा सकती है। हालिया पायलट प्रोजेक्ट में मिनिस्ट्री ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी ने लाईफाई (लाइट फिडेलिटी) तकनीक का परीक्षण कराया है। इसमें 10 जीबी प्रति सेकेंड तक की स्पीड से एक किलोमीटर के दायरे में डाटा ट्रांसमिशन वाले एलईडी बल्ब और लाइट स्पेक्ट्रम यूज किए जाते हैं। इस परीक्षण का मकसद उन बीहड़ इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाना है, जहां फाइबर केबल तो नहीं पहुंचा है, लेकिन बिजली है। इस तकनीक का इस्तेमाल अस्पतालों को जोड़ने में भी किया जा सकता है, जहां कुछ उपकरणों के चलते इंटरनेट सिग्नल हमेशा टूटता रहता है। इसके जरिए अंडरवॉटर कनेक्टिविटी भी मुहैया कराई जा सकती है।
इस परियोजना पर काम करने वाली ऑटोनॉमस साइंटिफिक बॉडी एजुकेशन एंड रिसर्च नेटवर्क की डायरेक्टर जनरल नीना पाहुजा ने कहा, लाईफाई का इस्तेमाल स्मार्टसिटीज में किया जा सकता है, जो मॉडर्न सिटी मैनेजमेंट के लिए इंटरनेट ऑफ थिंग्स थीम पर बनाई जा रही हैं और जो एलईडी बल्ब के जरिए कनेक्ट की जा सकती हैं। स्मार्ट सिटीज में वेस्ट डिस्पोजल से लेकर ट्रैफिक मैनेजमेंट तक के लिए बड़े पैमाने पर इंटरनेट ऑफ थिंग्स का इस्तेमाल होगा। लाईफाई का पायलट प्रोजेक्ट इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मद्रास के सहयोग से उसके कैंपस में लाइटिंग कंपनी फिलिप्स के साथ मिलकर कुछ महीने पहले किया गया था। पायलट प्रोजेक्ट क्लोज एनवायरमेंट में शुरू किया गया था, जिसका इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बेंगलुरु के साथ पाटर्नरशिप में ओपन स्पेस में टेस्ट करने का प्लान बनाया गया है। फिलिप्स लाइटिंग इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर सुमित जोशी ने बताया, हम इनोवेशन को लेकर कमिटेड हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के मोबाइल कम्युनिकेशन के प्रोफेसर हेरल्ड हास ने दो साल पहले लार्इफाई टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देना शुरू किया था। तब से गूगल जैसी कंपनियां और नासा जैसे ऑर्गनाइजेशंस इस टेक्नोलॉजी की टेस्टिंग में जुटी हैं। भारत में पिछले कुछ वर्षों में वाइटस्पेस जैसे विकल्पों के साथ भी प्रयोग किया गया है, जिसमें टीवी चैनलों के बीच डाटा रिले के लिए अनयूज्ड स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल किया जाता है। गूगल ने एलटीई या फोरजी टेक्नोलॉजी के जरिए 20 किलोमीटर की ऊंचाई पर तैरते बैलून के जरिए डेटा ट्रांसमिशन की भी टेस्टिंग की है। वाइटस्पेस में लाइसेंस्ड मोबाइल स्पेक्ट्रम की जरूरत होती है, जिसका टेलीकॉम लॉबी विरोध कर रही है।