पंजाब का लोहड़ी और दक्षिण का पोंगल


बी. डेविड

पंजाब में प्रति १३ जनवरी को मनाया जाने वाला लोहड़ी और दक्षिण भारत में मनाया जाने वाला पोंगल दोनों ही संक्रांति के ही रुप हैं। १३ जनवरी की शाम को पंजाब के लोग लकड़ियों का बड़ा सा ढेर लगाते हैं। आग जलाकर चारों ओर भांगड़ा करते हुए यह मनाते हैं कि बीते वर्षो की तरह आने वाला साल भी खुशियां लेकर आए। जिन परिवारों में शिशु जन्म या विवाह होते हैं उनमें विशेष रुप से लोहड़ी का आयोजन किया जाता है।रेवड़ी और गन्ना, लाई के साथ मिलाकर बांटा जाता है। सभी मित्र और रिश्तेदार उसी आग के चारों ओर बैठकर भोजन करते हैं। सभी एक-दूसरे को नववर्ष की बधाईयां देते हैं।
संक्राति पर्व दक्षिण भारत में पोंगल के नाम से मनाया जाता है। पोंगल पर्व में वर्षा के देव इंद्र की पूजा की जाती है। जिससे भरपूर वर्षा हो और अच्छी फसल हो। यह पर्व ‘इंद्रान’ भी कहलाता है। यह पर्व तीन दिन तक मनाया जाता है, चौथे दिन इसका समापन होता है।
यह दक्षिण भारत का सबसे बड़ा त्यौहार है। इसका पहला दिन बोगी पोंगल कहलाता है। इसमें घर को अच्छी तरह साफ किया जाता है। आंगन में पानी सींचकर चावल के आटे से सुंंदर रंगोली बनाई जाती है। कहीं-कहीं गाय के गोबर से बने कंडे में कद्दू का फूल संजाया जाता है। चावल, गन्ना और हल्दी के पौधे लाकर पूजा के लिए रखे जाते हैं। रात्रि के समय आग जलाई जाती है। जिसमें घर का बेकार, अनुपयोगी लकडत्री, आदि का सामान जला दिया जाता है। लड़कियां उस आग के इर्द-गिर्द नृत्य करती है।
दूसरे दिन सूर्या पोंगल कहलाता है। जिसमें सूर्य की पूजा की जाती है। दरवाजे के सामने सुबह ही रंगोली बनाई जाती है। इसे कोलम कहते हैं। महिलाएं बड़ी दिलचस्पी से घंटों में इसे पूरा करती है। इस दिन दाल चावल को मिलाकर शक्कर डालकर, उफान आने तक उबाला जाता है। सी उफान को देखकर बच्चे पोंगल-पोंगल पुकारते हैं। सूर्य की पूजा करके यही पोंगल का भोग लगाया जाता है। इसी प्रकार के अन्य पकवान चावल से ही बनाएं जाते हैं। सामूहिक भोज आयोजित किये जाते हैं।
तीसरा दिन मत्तू पोंगल कहलाता है। इस दिन गाय-बैलों को नहलाकर रंग लगाया जाता है। उनके सींगों को सजाया जाताहै। गणेश ओैर पार्वती की पूजा की जाती है। बैलों के सींगों में रूपये बांधकर छोड़ देते हैं औैर बड़े-बड़े पहलवान उनसे लड़कर रूपये खोलने का प्रयास करते हैं।
सब लोग रात में एक साथ मिलकर भोजन करते हैं।
पोंगल का पर्व का चौथा दिन समापन का होता है, इसे कनुम पोंगल कहते है। धरती पर जीवन के प्रतीक सूर्य की पूजा के बाद, सूर्य की प्रतिमा पर गन्ने के रस की बूंदे गिराई जाती है। रक्षा-बंधन और भाई-दूज की तरह बहने अपने भाईयों को सुख और समृद्धि की प्रार्थना करती है। इस दिन लोग एक दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते हैं।