वाजपेयी और मालवीय को ‘भारत रत्न’


नईदिल्ली । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और काशी िंहदू विश्व विद्यालय के संस्थापक मदन मोहन मालवीय को देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया जाऐगा। राष्ट्र्रपति प्रणव मुखर्जी ने ट्विटर पर जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और काशी िंहदू विवि के संस्थापक मदन मोहन मालवीय को ‘भारत रत्न’ से सम्मान दिया जाऐगा।
इससे पहले मोदी सरकार ने दोनों सदस्यों को भारत रत्न देने की पूरी तैयारी कर चुकी थी। बताया जा रहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस बारे में आज दोपहर एक सिफारिशी नोट राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को भेजने वाले थे। सूत्रों के अनुसार भारत रत्न देने से संबंधित पैâसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भाजपा के शीर्ष नेताओं अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी, राजनाथ िंसह और अमित शाह ने अवार्ड की मांग कर रहे थे।
गौरतलब है कि भारत के ११वें प्रधानमंत्री के रूप में एनडीए की पहली सरकार का नेतृत्व का करने वाले वाजपेयी ने १९९६ में १३ दिनों की सरकार चलाई थी और उसके बाद १९९८ से २००४ तक दूसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में देश का शासन चलाया। हालांकि भाजपा लंबे समय से अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने की मांग करती रही है। पिछले पांच सालों में उसने इस बाबत अपनी आवाज से जोर उठाई। वहीं दूसरी ओर लोकसभा चुनावों के दौरान अपने प्रचार अभियान में कई मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न देने की बात की थी।

प्रधानमंत्री रहते वाजपेयी ने किया था ‘भारत रत्न’ लेने से इंकार 
नईदिल्ली । भाजपा के शीर्षस्थ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने का निर्णय का चारो तरफ स्वागत हो रहा है खास बात यह है कि वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते ही सरकार के कई वरिष्ठ मंत्रियों ने आग्रह किया था कि उन्हें भारत रत्न दे दिया जाए।लेकिन उन्होंने तब मन कर दिया था जब १९९९ में करगिल युद्ध के बाद हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने जीत हासिल की थी और वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे। तब जीत का उत्साह पार्टी पर हावी था। १९९८ के परमाणु परीक्षण और करगिल में पाकिस्तान को धूल चटाने के बाद मिली जीत के बाद पार्टी के कई नेताओं को लगा कि वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए। वाजपेयी को ये दलीलें दी गर्इं कि जवाहरलाल नेहरु और इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए खुद को भारत रत्न दिलवाया था। वाजपेयी से कहा गया कि उनका भारतीय राजनीति में ऐसा ही मुकाम है लिहा़जा उन्हें ये सम्मान स्वीकार करना चाहिए, लेकिन अटलजी ने इनकार कर दिया था। उस समय उन्होंने कहा कि ये उचित नहीं लगता कि अपनी सरकार में खुद को ही सम्मानित किया जाए। आज जब उन्हें भारत रत्न देने का ऐलान हुआ है वो शायद इस पर अधिक प्रतिक्रिया देने की ाqस्थति में भी नहीं हैं, लेकिन यह ़जरूर है कि वाजपेयी को भारत रत्न मिलने में देरी हुई है। उन्होंने ़खुद को भारत रत्न न देकर एक बड़ा राजनीतिक उदहारण पेश किया था।
० अटल के परिवार में खुशी
वाजपेई के परिजनों ने इस पैâसले पर ़खुशी ़जाहिर की है। हालांकि, उनका कहना है कि इसमें थोड़ी देर हुई है, लेकिन फिर भी ये बड़ी बात है। भाजपा सांसद और अटल जी के भांजे अनूप मिश्रा ने भास्कर डिजिटल से बातचीत के दौरान कहा कि अटल जी को भारत रत्न दिए जाने की जब उन्हें सूचना मिली, तो आम िंहदुस्तानी की तरह उन्हें भी बहुत ़खुशी हुई। अनूप के मुताबिक, अटल जी वैश्विक शांति के दूत रहे हैं। मिश्रा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसके लिए उनका पूरा परिवार धन्यवाद देता है।
– ११ भाषाओं के ज्ञाता
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, भारतीय जनसंघ के संस्थापक, भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य, कवि और ११ भाषाओं के ज्ञाता अटल बिहारी वाजपेयी को कौन नहीं जानता। भारतीय राजनीति में सबसे प्रतिाqष्ठत नेता और बातों के धनी वाजपेयी को उनके जन्मदिन पर वेंâद्र सरकार ने भारत रत्न से नवाजने का पैâसला किया है। बाजपेयी तीन बार भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अपनी सेवा दे चूके हैं। अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म २५ दिसंबर १९२४ को मध्यप्रदेश के ग्वालियर में गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी हिन्दी एवं ब्रज भाषा के एक कवि थे तथा गांव के स्वूâल में शिक्षक का कार्य करते थे इसलिए वायपेयी को काव्य विरासत में मिली।
वाजपेयी ने प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर के सरस्वती शिशु मंदिर से पूरी की। इसके बाद इन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज (अब लक्ष्मीबाई कॉलेज) से हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत विषय में डििंस्टगशन के साथ स्नातक की पढ़ाई पूरी की। कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति शास्त्र में प्रथम स्थान के साथ एमए की उपाधि प्राप्त की।
इसके बाद वाजयेपी आरएसएस के पूर्णरूपेण सदस्य बन गए। इसी दौरान उन्होंने लॉ की पढ़ाई शुरू की, मगर बीच में ही कोर्स को छोड़ पत्रकारिता में आ गए।
० पत्रकारिता से शुरूआत
पत्रकारिता का चुनाव करना उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलाqब्ध थी, क्योंकि उस समय पूरे देश में आजादी की लहर चल रही थी। उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’ (मासिक हिन्दी), ‘पाञ्चजन्य’ (साप्ताहिक हिन्दी), ‘स्वदेश’ (रोजाना) तथा ‘वीर अर्जुन’ (रोजाना) पत्रिका का संपादन किया। संघ के अन्य सदस्यों की तरह वाजपेयी ने कभी भी शादी नहीं करने का पैâसला लिया, जो आज तक कायम है। वाजयेपी १९४२ में राजनीति में उस समय आए, जब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनके भाई २३ दिनों के लिए जेल गए। १९५१ में वाजपेयी ने आरएसएस के सहयोग से भारतीय जनसंघ पार्टी बनाई जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेता शामिल हुए। १९५४ में कश्मीर दौरे पर वाजपेयी के साथ गए मुखर्जी की उस समय मौत हो गई, जब दूसरे राज्य से कश्मीर घूमने आए एक युवक की गलत इलाज के बाद मौत हो गई जिसका वे भूख हड़ताल कर विरोध जता रहे थे। मुखर्जी की मौत से वाजपेयी को गहरा झटका लगा। १९५७ में वाजपेयी पहली बार बलरामपुर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर राज्यसभा के सदस्य बने। वाजपेयी के असाधारण व्यक्तित्व को देखकर उस समय के वर्तमान प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा। १९६८ में वाजपेयी राष्ट्रीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उस समय पार्टी के साथ नानाजी देशमुख, बलराज मधोक तथा लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता थे। १९७५-७७ में आपातकाल के दौरान वाजपेयी अन्य नेताओं के साथ उस समय गिरफ्तार कर लिए गए, जब वे आपातकाल के लिए इंदिरा गांधी की आलोचना कर रहे थे। १९७७ में जनता पार्टी के महानायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आपातकाल का विरोध हो रहा था।
जेल से छूटने के बाद वाजयेपी ने जनसंघ को जनता पार्टी में विलय कर दिया। १९७७ में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी और वे मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में बाहरी मामलों के मंत्री बने।
विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले ऐसे नेता है जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासंघ को हिन्दी भाषा में संबोधित किया था। जनता पार्टी की सरकार १९७९ में गिर गई, लेकिन उस समय तक वाजपेयी ने अपने आपकी एक अनुभवी नेता व वक्ता के रूप में पहचान बना ली थी। इसके बाद जनता पार्टी अंतरकलह के कारण बिखर गई।
१९८० में वाजपेयी के साथ पुराने दोस्त भी जनता पार्टी छोड़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए। वाजपेयी भाजपा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। इसके बाद वे कांग्रेस सरकार के सबसे बड़े आलोचक बनकर उभरे।
भाजपा ने पंजाब में हुए सिखों दंगों को सेना द्वारा खत्म करने की काफी आलोचना की और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर देश में सबसे खराब नेतृत्व तथा उसमें भ्रष्टाचार सहित इस दंगे का भी आरोप लगाते हुए उनसे तुरंत इस्तीफा देने का दबाव डाला।
भाजपा ने १९८४ में सिखों के विरुद्ध ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ का समर्थन करने से इंकार कर दिया और इस ऑपरेशन का पूरी तरह विरोध किया। उस समय सिख भागकर दिल्ली आ गए। उसी दौरान इंदिरा गांधी के दो सिख गार्डों ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी। १९८४ में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को दो सीटों को नुकसान हुआ और वाजपेयी संसद में विपक्ष के नेता बने।
भाजपा विश्व हिन्दू परिषद तथा आरएसएस द्वारा चलाए जा रहे राम जन्मभूमि आंदोलन की राजनीतिक सहयोगी पार्टी बन गई। यह आंदोलन राम की नगरी अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनाने की मांग कर रहा था।
१९९४ में कर्नाटक तथा १९९५ में गुजरात और महाराष्ट्र में पार्टी जब चुनाव जीत गई उसके बाद पार्टी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया।
वाजपेयी १९९६ से लेकर २००४ तक ३ बार प्रधानमंत्री बने। १९९६ के लोकसभा चुनाव में बीजेपी देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने। उनकी सरकार १३ दिनों में संसद में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं करने के कारण गिर गई। १९९८ के दुबारा लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्यादा सीटें मिलीं और कुछ अन्य र्पािटयों के सहयोग से वाजपेयी ने एनडीए का गठन किया और वे फिर प्रधानमंत्री बन गए।
यह सरकार १३ महीनों तक चली, क्योंकि बीच में ही जयललिता की पार्टी ने सरकार का साथ छोड़ दिया था और सरकार गिर गई। १९९९ में हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी फिर से सत्ता में आई और इस बार वाजपेयी ने अपना कार्यकाल पूरा किया।
वाजपेयी के शासनकाल में कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं जिसमें कारगिल युद्ध, दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू करना, संसद पर आतंकी हमला, गुजरात दंगे आदि प्रमुख हैं।
वाजपेयी ने अपने दूसरे कार्यकाल में अंतरराष्ट्रीय परमाणु संगठन की रोक के बावजूद राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण किया जिसका पाकिस्तान सहित कई देशों में विरोध किया गया और रूस और प्रâांस ने भारत का समर्थन किया।
इसके बाद १९९८ के अंत तथा १९९९ की शुरुआत में वाजपेयी पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता करने लिए पाकिस्तान गए और कश्मीर सहित कई मसले सुलझाकर कई समझौतों पर हस्ताक्षर किया। उसी दौरान वाजपेयी ने दिल्ली-लाहौर बस सेवा शुरू की।
भारत के द्वारा परमाणु परीक्षण से नाराज पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। भारत ने उसका मुहतोड़ जवाब देकर उसे उसके घर में घुसकर मार भगाया। इस युद्ध में भारतीय विजय ऑपरेशन वाजपेयी के नेतृत्व में चल रहा था।
इस दौरान ५०० से ज्यादा भारतीय सैनिक तथा १५०० से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक मारे गए थे। २००१ में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने संसद पर हमला कर दिया था जिसे भारतीय सैनिकों ने मार गिराया था।
२००० में वाजपेयी ने नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के अंदर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना शुरू की। २००२ में हुए गुजरात दंगे के छींटें भी वाजपेयी पर पड़े। २००५ में वाजपेयी ने राजनीति से संन्यास ले लिया। उसी समय राज्यसभा को संबोधित करते समय वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन िंसह ने वाजपेयी को वर्तमान राजनीति का भीष्म पितामह कहा था जिसे पूरी दुनिया ने सराहा था।
वाजपेयी के पुराने दोस्तों के अनुसार वाजपेयी ने एक बेटी गोद ली है जिसका नाम नमिता है और उसने भारतीय संगीत और नृत्य भी सीखा है। १९९२ में वाजपेयी को पद्मविभूषण, १९९३ में कानपुर विश्वविद्यालय से डीलिट की उपाधि, १९९४ में लोकमान्य तिलक अवॉर्ड, १९९४ में बेस्ट संसद का अवॉर्ड, १९९४ में भारतरत्न व पंडित गोिंवद वल्लभ पंत अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

‘अस्वस्थ’ अटल जी को घर पर दिया जा सकता है ‘भारत रत्न’
नईदिल्ली । पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान `भारत रत्न’ देने का ऐलान किया है, लेकिन उनकी सेहत को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि वह किस तरह सम्मान प्राप्त करने राष्ट्रपति भवन जाएंगे। वाजपेयी लंबे समय से अस्वस्थ हैं और वह घर से बाहर नहीं निकलते। कई वर्षों से वह किसी सार्वजनिक मंच पर नजर नहीं आए। जानकारी के मुताबिक, अपना ज्यादातर वक्त व्हीलचेयर पर गुजारने वाले वाजपेयी लोगों को पहचान भी नहीं पाते। वाजपेयी को उनके निवास स्थान पर सम्मान दिया जाएगा। दरअसल, पहले भी पंडित भीमसेन जोशी को साल २००८ में उनके निवास स्थान पर ही भारत रत्न दिया गया था। अभिनेता प्राण को भी दादा साहब फाल्के पुरस्कार देने तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी उनके घर गए थे। एक संभावना यह भी है कि अटल की ओर से उनका कोई प्रतिनिधि या रिश्तेदार राष्ट्रपति भवन पहुंचकर यह सम्मान ग्रहण करे।
अटलजी को रूटीन जांच के लिए चुपचाप एम्स ले जाया जाता है। इस दौरान किसी को कोई तस्वीर लेने की इजाजत नहीं होती। उनके घर पर आने की इजाजत भी चुिंनदा लोगों को ही है। ऐसे में अगर वह सम्मान लेने राष्ट्रपति भवन गए या अधिकारी उनके घर पहुंचे तो लोगों को लंबे समय बाद उनकी ताजा तस्वीरें देखने को मिलेगी।

मदन मोहन मालवीय के बारे में १० बड़ी बातें
नई दिल्लीr। भारत रत्न महामना मदन मोहन मालवीय के बारे में १० बड़ी बातें- महामना मदन मोहन मालवीय का जन्म २५ दिसंबर १९६१ को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में हुआ था। उनकी निधन १२ नवंबर १९४६ को बनारस में हुआ। १००९,१९१८,१९३२,१९३३ में मदन मोहन मालवीय चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। सत्यमेव जयते’ शब्द के प्रचार प्रसार में अहम भूमिका रही। शिक्षा, पत्रकारिता, वकालत में महामना जी ने कई अहम सक्रिय काम किए। महामना मदन मोहन मालवीय ने १९१६ में प्रतिष्ठित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। वे भारत के पहले और अन्तिम व्यक्ति थे जिन्हें महामना की सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीयजी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता-१८८६) से लेकर अपनी अन्तिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया। चौरा-चौरा कांड में १७० दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई, जिसमें से पंडित जी ने १५१ को छुड़ा लिया। राष्ट्रनेता मालवीय जी के बारे में स्वयं पं० जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है कि, अपने नेतृत्वकाल में हिन्दू महासभा को राजनीतिक प्रतिक्रियावादिता से मुक्त रखा और अनेक बार धर्माे के सहअस्तित्व में अपनी आस्था को अभिव्यक्त किया। प्रयाग के भारती भवन पुस्तकालय, मैकडोनेल यूनिवर्सिटी हिन्दू छात्रालय और मिण्टो पार्क के जन्मदाता, बाढ़, भूकम्प, सांप्रदायिक दंगों व मार्शल ला से त्रस्त दु:खियों के आँसू पोंछने वाले मालवीयजी को ऋषिकुल हरिद्वार, गोरक्षा और आयुर्वेद सम्मेलन तथा सेवा समिति, ब्वॉय स्काउट तथा अन्य कई संस्थाओं को स्थापित अथवा प्रोत्साहित करने का श्रेय प्राप्त हुआ। कांग्रेस के निर्माताओं में विख्यात मालवीयजी ने उसके द्वितीय अधिवेशन (कलकत्ता-१८८६) से लेकर अपनी अन्तिम साँस तक स्वराज्य के लिये कठोर तप किया। उसके प्रथम उत्थान में नरम और गरम दलों के बीच की कड़ी मालवीयजी ही थे जो गान्धी-युग की कांग्रेस में हिन्दू मुसलमानों एवं उसके विभिन्न मतों में सामंजस्य स्थापित करने में प्रयत्नशील रहे। एनी बेसेंट ने ठीक कहा था कि मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि विभिन्न मतों के बीच, केवल मालवीयजी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।

अब तक 45 महानुभावों को मिला ‘भारत-रत्न’
नईदिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा स्वतंत्रता सेनानी महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया है। वर्ष १९५४ में स्थापित किए गए सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवा़जे गए महानुभावों की संख्या अब ४५ हो गई है। पिछले वर्ष यह सम्मान विश्व में सबसे ़ज्यादा अंतरराष्ट्रीय शतक बनाने वाले क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर तथा प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ सीएनआर राव को प्रदान किया गया था। आइए, पढ़ते हैं, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा स्वतंत्रता सेनानी महामना पंडित मदन मोहन मालवीय से पहले किन-किन हाqस्तयों को यह सम्मान प्रदान किया गया है।

१९५४- चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, डॉ चंद्रशेखर वेंकटरमण, डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
१९५५- डॉ भगवान दास, सर डॉ मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया, पंडित जवाहरलाल नेहरू
१९५७- गोिंवद वल्लभ पंत
१९५८- डॉ धोंडो केशव कर्वे
१९६१- डॉ बिधान चंद्र रॉय, पुरुषोत्तम दास टंडन
१९६२- डॉ राजेंद्र प्रसाद
१९६३- डॉ ़जाकिर हुसैन, डॉ पांडुरंग वामन काणे
१९६६- लालबहादुर शास्त्री
१९७१- इंदिरा गांधी
१९७५- वराहगिरि वेंकट गिरि
१९७६- के कामराज
१९८०- मदर टेरेसा
१९८३- आचार्य विनोबा भावे
१९८७- खान अब्दुल गफ्फार खान
१९८८- मजी रामचंद्रन
१९९०- डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर, नेल्सन मंडेला
१९९१- राजीव गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मोरारजी देसाई
१९९२- मौलाना अबुल कलाम आ़जाद, जेआरडी टाटा, सत्यजीत रे
१९९७- गुलजारी लाल नंदा, अरुणा आस़फ अली, डॉ एपीजे अब्दुल कलाम
१९९८- एमएस सुब्बूलक्ष्मी, चिदम्बरम, सुब्रमण्यम
१९९९- जयप्रकाश नारायण, रविशंकर अमत्र्य सेन, गोपीनाथ बोरदोलोई
२००१- लता मंगेशकर, उस्ताद बिाqस्मल्ला ़खां
२००९- भीमसेन जोशी
२०१३- सचिन तेंदुलकर, सीएनआर राव
२०१४- मदन मोहन मालवीय, अटल बिहारी वाजपेयी