बिना रोजगार सब निराधार


एक तंदुरुस्ती हज़ार नियामत हमने पढ़ा है और सुना भी है, महसूस भी किया है।
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एक तंदुरुस्ती हज़ार नियामत हमने पढ़ा है और सुना भी है, महसूस भी किया है। सही मायने में कोई भी कितना भी समृद्ध क्यो न हो, अगर तंदुरुस्त नही है तो समृद्धि बेकार है। वैसे ही एक ओर बात शास्वत सत्य है कि जब तक आजीविका उपार्जन का निश्चित साधन नही होता है तब तक न शरीर को तंदुरुस्ती महसूस होती है न मन को। इस अर्थ प्रधान युग मे अर्थ का उपार्जन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। और उसके लिए रोजगार का साधन निनान्त आवश्यक है।
वर्तमान सरकार जिस पार्टी की है वो जब संकल्प पत्र जनता के समक्ष पेश की थी तो उसने अन्य बातों के साथ साथ रोजगार के साधन मुहैया करवाकर 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने की बात भी संकल्प पत्र में प्राथमिकता से कही थी। लेकिन वर्तमान की स्थिति बेहद विकट तथा चिंतनीय है, क्योकि जीएसटी नोटबन्दी के बाद न सिर्फ व्यापार कम हुआ बल्कि निजी क्षेत्रों में जो नोकरियो के अवसर थे वो भी कम हो गए।
यह स्थिति कितनी भयावह है इसका आंकलन करने के लिए आपको अभी के एक ताजातरीन वाकये के बारे में बताता हूँ। वैसे यह कोई नई बात नही है कि कम पदों के सामने ज्यादा या अत्यधिक ज्यादा आवेदक आ गए हो। लेकिन तमिलनाडु में कुछ अलग ही हुआ। तमिलनाडु विधानसभा में स्वीपर और सेनीटरी वर्कर के 14 पदों के लिए आवेदन मंगाए गए थे। इसके लिए इंजीनियरों (एमटेक,बीटेक) और एमबीए समेत 4600 उम्मीदवारों ने आवेदन किया है। इसके अलावा कई डिप्लोमाधारियों ने भी इन पदों के लिए आवेदन भेजे है।
26 सितंबर को विधानसभा सचिवालय ने इन पदों के लिए आवेदन मंगाए थे। उम्मीदवारों के सिलेक्शन के लिए एकमात्र योग्यता शारीरिक रूप से सक्षम होना रखी गई थी। साथ ही आवेदक की न्यूनतम उम्र 18 साल होनी चाहिए। अधिकतम उम्र के बारे में कुछ नहीं बताया गया। सचिवालय को कुल 4607 आवेदन प्राप्त हुए, जिसमें एम्प्लॉयमेंट एक्सचेंज से आईं एप्लीकेशन भी शामिल हैं। इसमें से 677 एप्लीकेशन खारिज कर दी गईं।
जिस पद के लिए कोई भी शैक्षणिक योग्यता की बाध्यता न हो ऐसे पद के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त डिग्रीधारी अगर आवेदन करते है तो हम समझ सकते है कि बेरोजगारी किस हद तक व्याप्त हो गई है। उच्च शिक्षा प्राप्त तथा तकनीकी शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी रोजगार से वंचित है। उसके अभिभावकों ने जो स्वप्न देखकर उसे उच्च शिक्षा दिलवाई वो व्यक्ति डिग्री हाथ मे लिए अपने अभिभावकों के उन सपनों को रोज मरता हुआ देखता है। और आखिर में कुछ अच्छा नही कर पाता तो वो गलत रास्ते चुनने के लिए भी मजबूर हो जाता है।
अगर सरकार नवीन नोकरियो का सृजन नही कर सकती तो उसे अन्य स्वरोजगार के साधन जरूर विकसित करने चाहिए जिससे कि शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति अपनी आजीविका के लिए दर दर न भटके।
आगे लोकसभा चुनाव है, हर पार्टी रोजगार वृद्धि के लिए अच्छे अच्छे लोकलुभावन वादे करेगी, पर क्या इस कार्य को प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन करने के उपाय भी जनता के समक्ष रखेगी? अगर क्रियान्वयन करने की रूपरेखा ही न हो तो जनता को भी उसे जुमला मान उसे सिरे से खारिज कर देना चाहिए, ताकि फिर कोई वादा करे तो उसे निभाने का तरीका, जरिया भी बताए।
सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय