ट्यूशन क्लासेस: एक प्रत्यक्ष व्यापार


सूरत ही नही आजकल लगभग भारत मे सभी जगह निजी स्कूलों के अलावा ट्यूशन क्लासेस में बच्चो को पढ़ाना स्टेटस सिंबल हो रखा है।
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सूरत ही नही आजकल लगभग भारत मे सभी जगह निजी स्कूलों के अलावा ट्यूशन क्लासेस में बच्चो को पढ़ाना स्टेटस सिंबल हो रखा है। जबकि बच्चा स्कूल में जाकर घण्टो मेहनत करता है फिर भी उसको ट्यूशन क्लास में भेजना कहाँ तक जरूरी है, यह कोई नही सोचता है। अगर हम बच्चे को स्कूल शिक्षण के लिए भेजते है तो क्यो नही वही से वो सम्पूर्ण शिक्षण भी प्राप्त करे। सूरत में ऐसी काफी कक्षाएं संचालित हो रही है। सबसे बड़ी बात यह है कि उन क्लासेस में नियमो की अनदेखी बड़े पैमाने पर की जाती है। लेकिन इसके लिए नियमन करने वाला कोई नही है। न ही नियमो में चूक होने से उन पर कोई कार्यवाही होती है , न इसके लिए कोई आवाज ही उठाता है।

शहर में कॉमर्सियल कॉम्प्लेक्स में छोटी छोटी दुकानों में यह क्लासेस ऐसे ही चल रही है जैसे कि कोई दुकान ही हो। जहाँ शिक्षा का व्यापार होता है। यह क्लासेस एक प्रकार से स्कूल की तरह ही संचालित होती है परन्तु बच्चो के लिए वहां प्राथमिक सुविधाओ का भी अभाव होता है। ऐसे क्लास कोई भी चालू कर लेता है क्योकि इनको शिक्षा विभाग द्वारा किसी विशेष मान्यता की जरूरत भी नही होती है। इन क्लासेस में बच्चे ठूंस ठूंस कर भरे जाते है तो इसके शिक्षक अच्छा परिणाम देने में भी असक्षम रहते है। पूछने पर वो भी स्कूल की तरह जबाब देते है कि हमने तो आपके बच्चे पर बहुत मेहनत की पर यही सर्वाइव नही कर पाया।

इन क्लासेज की फीस भी बड़ी भारी होती है। स्कूल की फीस के लिए सोचने वाले अभिभावक भी इन क्लास के मायाजाल में फंसकर बड़ी रकम चुकाते हुए देखे जाते है। जितना बड़ा नाम उतना बड़ा दाम वाली कहावत यहां लागू होता है। शिक्षक वही सामान्य होते है जो स्कूल में होते है। सुबह सभी विद्यालयों का समय होने के कारण इनका समय ज्यादातर शाम का ही होता है तथा कुछ तो देर रात तक चालू रहते है। इस कारण बच्चो को अन्य खतरे भी हो सकते है।  पिछले साल एक ट्यूशन क्लास में आग लगने के कारण जनहानि भी हुई थी। तब लगा था कि प्रशासन अब सतर्क होकर इस ओर ध्यान देगा लेकिन जैसे जैसे दिन गुजरे वैसे वैसे यह मामला ठंडा पड़ता गया। तथा अभी भी ऐसे क्लासेस वैसे ही धड़ल्ले से चल रहे है जैसे पहले चल रहे थे।

जो बड़े इंस्टिट्यूट है उनके खर्चे बड़े स्कूलो की तरह ही होते है। वो विद्यालयों की तर्ज पर वार्षिक कार्यक्रम भी रखते है। जिसमे बच्चो को अतिरिक्त भुगतान भी करना पड़ता है। उनके संस्थान में प्रवेश के लिए भी कई प्रकार की फॉरमैलिटी से गुजरना पड़ता है जबकि मेहनत तो बच्चो को ही करनी पड़ती है तो वो मेहनत स्कूल में क्यो नही? अगर ज्यादा किसी बच्चे पर ध्यान देने की जरूरत भी हो तो इस तरह के क्लासेस की बजाय उसे स्कूल द्वारा रेमेडियल क्लास के रूप में अतिरिक्त क्लास देकर उस कमी को पूरा किया जा सकता है जिसकी आवश्यकता बच्चे को हो। इस ओर न सिर्फ अभिभावकों को बल्कि प्रशासन को भी ध्यान देने की आवश्यकता है कि ट्यूशन क्लास मानदंडों पर खरी है या नही? उसमे विद्यार्थियों की क्षमता का विकास हो रहा है या नही? प्राथमिक सुविधाएं उपलब्ध है या नही? तभी हमारे देश के बच्चो का भविष्य उज्ज्वल हो पायेगा तथा देश की तरक्की में उसका भी योगदान होगा।

सर्व आश्रयदात्री भारत माता की जय